Monday, April 7, 2008

जिस्मो को मिलना ही नही तो मन मिलाना किस लिए

अब छोडिये भी क्या कहें कि आप क्या करते रहे
 पास रह कर भी हमेशा दूरीयां रखते रहे
 ना कभी हाथों मे हाथ ना चले दो कदम साथ
 जाने खुदा किस बात पे चाह्त का दम भरते रहे
 तुम मेरे करीब आओ ये तो कभी हुआ नही
तुम तो बस जबानी जमाखर्च ही करते रहे
 माना मन मिले बिना व्यर्थ है जिस्मों का मिलना
 पर मन से मन मिले हुए तो इक जमाना हो चला
 और कितनी उम्र तक मन मिलाओगे सनम
 पहले ही ये जिस्म तो बरसों पुराना हो चला
 केवल रूहानी प्यार की जो बात करते हैं सनम
या तो खुद पागल हैं या पागल बनाते है सनम
जिस्म के बिना बता रूह का कहीं वजूद है
रूह भी तब तक रहेगी जब तक जिस्म मौजूद है
 जिस्मो को मिलना ही नही तो मन मिलाना किस लिए
 और मन अगर मिलने नही तो आना जाना किस लिए
 मन का मिलना प्यार मे सीढी से ज्यादा कुछ नहीं
जब छत पे चढना ही नही सीढी लगाना किस लिए

Sunday, April 6, 2008

बिन बात किये ही हर एक बात खत्म हो गयी

बिन बात किये ही हर एक बात खत्म हो गयी
 दिन कभी कम पड़ गया कभी रात खत्म हो गयी
 मै ना बोल पाया कुछ तो काश तुम ही बोलती
 खामोशी के तराजू में क्यों शब्द रही तोलती
तुम भी कुछ ना कह सकी मै भी कुछ ना कह सका
 जाने क्यों दिल ने कह दिया कि बात खत्म हो गयी
 ना तो भीगा तन बदन, ना ही बुझी मन की जलन
दो चार बून्दो से कहाँ बुझती है सदियों की अग्न
तन भी प्यासा मन भी प्यासा दोनो प्यासे रह गये
  जाने क्यों मौसम कह गया बरसात खत्म हो गयी
 ना मिली नजरो से नजरें थामा ना हाथो ने हाथ
ना ठहरे संग पल दो पल ना चले दो कदम साथ
ना गिला ना शिकवा ना ही कसम ना वादा कोई
जाने क्यों वक्त ने कहा, मुलाकात खत्म हो गयी
 सदियों की इन्तजार बाद आयी मिलन की रात
 सपनो मे देखा था जिसे, बाहों मे था वो साक्षात
 दिल मे तुफाँ, होठो पे ताले, क्या कहें क्या ना कहें
हम सोचते ही रह गये और रात खत्म हो गयी
बिन बात किये ही हर एक बात खत्म हो गयी

Thursday, April 3, 2008

सूखी घास मे डाल दी है तुमने जलती चिन्गारी

 सूखी घास मे डाल दी ही तुमने जलती चिन्गारी
देखना अब ये गल्ती तुम पे पडेगी कितनी भारी
 सोचा तुमने एक छोर को आग लगा मज़ा लोगे
और जरूरत पड़ी तो अपना छोर बचा तुम लोगे
 पर आग लगी इस छोर तो अंतिम छोर तलक जायेगी
 भडक गयी इक बार तो फिर नही रोके रुक पायेगी
 शान्त तभी होगी ज्वाला जब जलेगी ढेरी सारी
 देखना------
 सीमाओ में बान्धे खडा है बान्ध ये पानी कब से
 एक बून्द भी इधर से उधर हुआ नही ये तब से
तुम क्यों फिर बारूद लगा इस बान्ध को तोड रहे हो
पानी का रुख अपनी ओर ऐसे क्यों मोड़ रहे हो
ये नहर नही ना नदिया है जो सीमाये पह्चाने
टूटा बान्ध क्या क्या ले डूबे ये तू अभी क्या जाने \
अपने संग ये ले डूबेगा तेरी बस्ती सारी
 देखना अब्…॥
 धीरे धीरे हम तो प्रीत को तोड़ चुके थे सब से
प्रियतम से मिलने की आस को छोड चुके थे कब से
हम ने तो इस तन्हाई का गिला किया नही रब से
 फिर कयों रब ने तुझे मिलाया छुड़ा के रिश्ता सब से
तुम ने जानू कह कर मेरी जान ये क्या कर डाला
 बुझे हुये इस मन मे जगा दी फिर से प्रेम की ज्वाला
 जाने कौन जादू की झप्पी तुमने हमको मारी
देखना अब ये गल्ती तुम पे पडेगी कितनी भारी
Posted by Krishan lal "krishan" at 18:20 0 comments

Wednesday, April 2, 2008

जब घर मे तेरी चूड़ी का टूटा हुआ टुकड़ा मिला

मैने तुम से कब कहा कि तुम हो सनम बेवफा
क्यों सुना रहे हो फिर मजबूरियों की दास्ताँ
 पर ये भी कोई यार का यार से मिलना हुआ
 एक इक कदम आगे बढ़ा तो दूजा दो पीछे हुआ
 काफी था राहों में मिलना घर बुला के क्या हुआ
घर में भी जब तू मिला तो फासले रख के मिला
 जिस्मो का स्पर्श तो मानो अनहोनी बात थी
 हाथों को हाथ छू गया तो भी तुझे हुआ गिला
 दूरीयां कायम रही और रात सारी कट गई
किस कदर तहजीब से इक यार यार से मिला
 पर कौन मानेगा मेरी कि फासले कायम रहे
 जो घर में तेरी चूडी का टूटा हुआ टुकडा मिला
 पास रह के इतनी दूरी और अब मुमकिन नहीं
 इतनी दूरी रखनी है तो फिर तूँ दूर ही भला
 बातों से बात बनने वाली है नही मेरे हजूर
प्यार है तो प्यार कर या खत्म कर ये सिलसिला