Wednesday, May 27, 2026

चाहे जैसी भी हो, हर ज़िंदगी यूँ ही खाक होती है

कोई बेचारा होता है, किसी की धाक होती है

कोई बदनाम होता है, किसी की साख होती है

कोई अफसोस करता है, कमाई कुछ नहीं उसकी

कोई खुश है, कमाई उसकी कई-कई लाख होती है

नतीजा सारी बातों का मगर निकला तो क्या निकला

बस आखिर में तो मटकी में दो मुट्ठी राख होती है

और वो भी रख नहीं सकते विसर्जन करना पड़ता है

चाहे जैसी भी हो हर ज़िंदगी यूँ ही खाक होती है 

गया वो जाना था जिसको जो बच गए अपनी वो सोचे

ना अब कोई दिल से रोता है ना अब कोई आँख रोती है

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