Friday, May 29, 2026

लिखो जो नया इतिहास किसी के पास वो अब तलवार नहीं

बूढ़ा हूँ पर बीमार नहीं मजबूर नहीं लाचार नहीं

जब तक एक सांस भी बाकी है हार मुझे स्वीकार नहीं

मरना तो सभी को एक दिन फिर मरने से काहे डरना

लेकिन जीते जी मरने सा जीने को मैं तैयार नहीं

कुछ बीज बचे हैं उम्मीदों के बो ने को कहाँ जाऊँ बोलो

ना जगह ही अच्छी मिलती है बारिश के कोई आ सार नहीं

अपनी अपनी मंजिल की तरफ सब मुझे घसीटना चाहते हैं

मेरी मंजिल तक संग मेरे कोई चलने को तैयार नहीं

पिछला इतिहास तो पढ़ने में दिलचस्पी सभी की है यारों

लिखे जो नया इतिहास किसी के पास वो अब तलवार नहीं





Thursday, May 28, 2026

फर्क है बस इतना यारा तेरे होने या ना होने में

 फर्क है बस इतना यारा तेरे होने या ना होने में

जितना फर्क है खुलकर हंसने या जी भर के रोने में

प्यार को पाया पा कर खोया तब जाकर ये पता चला

फर्क बहुत है प्यार को अपने पाने में या खोने में

आने को नींद मुझे पत्थर की शिला पे भी आती है

लेकिन अंतर है पत्थर और गद्देदार बिछौने में

करवट बदल बदल के यूँ तो रात गुजर भी सकती है

है फर्क बताती सुबह रात भर जागने में और सोने में

साथ में तुम होते हो मेरे दिन रात ही कुछ और होते हैं

है फर्क अकेला पड़े रहने और साथ यार के सोने में

फसल उगी तो तब जाना फर्क बहुत ही गहरा है

कीकर के खुद उग आने या बगिया में आम के बोने में

जानू इतना फर्क है तेरे होने या ना होने में

है जितना जिंदा रहने या फिर जिंदा लाश को ढोने में

पर ये भी सच है जानू तुझ से प्यार इस हद तक आ पहुंचा

तेरी खुशी की खातिर मैं तैयार हूँ फिर तुझे खोने में

प्यार था तुझ से प्यार है तुझ से प्यार तुझी से रहना है

फर्क नहीं पड़ता अब तेरे होने या ना होने में

उस बेवफा ने साथ चलना जब से छोड़ा है

तकदीर मेरा साथ अब देने लगी हरदम

तकदीर पे भरोसा करना जबसे छोड़ा है

मंजिलों का मिलना कुछ आसान हो गया

हवा ने रुख जब से मेरे विपरीत मोड़ा है

जब दौड़ में दोनों ही बाजी हारे बैठे हैं

क्या फर्क कौन तेज कौन धीरे दौड़ा है

कोई भी दर्द अब मुझे नहीं दर्द दे पाता

जब से हमदर्दों ने मेरा साथ छोड़ा है

अब खफा मुझ से कोई होता नहीं हरगिज

आइना दिखाना हमने जबसे छोड़ा है

आने लगी है घर में मेरी रोशनी बहुत

खिड़की का शीशा दुश्मनों ने जबसे तोड़ा है

रफ़्तार बढ़ गई है अब चलने की कुछ मेरे

उस बेवफा ने साथ चलना जब से छोड़ा है

Wednesday, May 27, 2026

चाहे जैसी भी हो, हर ज़िंदगी यूँ ही खाक होती है

कोई बेचारा होता है, किसी की धाक होती है

कोई बदनाम होता है, किसी की साख होती है

कोई अफसोस करता है, कमाई कुछ नहीं उसकी

कोई खुश है, कमाई उसकी कई-कई लाख होती है

नतीजा सारी बातों का मगर निकला तो क्या निकला

बस आखिर में तो मटकी में दो मुट्ठी राख होती है

और वो भी रख नहीं सकते विसर्जन करना पड़ता है

चाहे जैसी भी हो हर ज़िंदगी यूँ ही खाक होती है 

गया वो जाना था जिसको जो बच गए अपनी वो सोचे

ना अब कोई दिल से रोता है ना अब कोई आँख रोती है