Friday, February 29, 2008

लोग कह्ते है कवितायें ना लिखा कीजे

लोग कहते हैं कवितायें ना लिखा कीजे ।
 दर्द जब हद से गुजर जाये तो फिर क्या कीजे ॥
 वो जो कहते है मेरे गीत है बस दर्द भरे ।
 छाले मेरे दिल के कभी उनको दिखा ही दीजे
॥ जो सलाह देते है उम्मीद से जीने की सदा ।
 जहर जो मैने पिया थोड़ा उनको चखा ही दीजे
 फिर ना हसरत से कभी देखेगी किसी दुल्हन को
 मेहन्दी उन हाथों मे इक रोज लगा तो दीजे
 जो भी मिलता है कोई जख्म नया देता है
किन्हीं हाथों में मरहम,खुदा,अब तो थमा भी दीजे
 कोई देता है जख्म कोई छिड़कता है नमक
 रह गयी हैं क्या जमाने मे ये दो ही चीजे
 जख्म देखेंगे तो दिल उनका दहल जायेगा
मेरे जख्मों को किसी तरह छुपा भी दीजे

Thursday, February 28, 2008

उस रोज तुम खुद को कहोगे बेवफा

इस हाद्सों के शहर मे हो ही गया फिर हाद्सा
मैने भले रखा कदम एक एक संभलते हुये ॥
 सोचा ना था मिल जायेगी सरेराह हम को जिन्दगी
 हम तो गुजरे थे इधर से यूँ ही टहलते हुये ॥
 पेश ना करते कभी तेरे सामने शीशे का दिल
तेरे हाथों में गर देख लेते पत्थर उछलते हुये
 जिस दम पे तुम दम ठोंक ठुकराते रहे हरदम
मुझे आज देखेंगे हमदम तेरा दम वो निकलते हुये
 हाथों मे हाथ डाल तमन्ना थी तेरे संग चले
पर रह गये है देख खाली हाथ हम मलते हुये
 ये ना कह, तेरा मिलन, मुझसे कभी मुमकिन ना था
 देखा नहीं, क्या तुमने, धरती से गगन मिलते हुये॥
 चलो मै नही कह्ता,पर तुम खुद को कहोगी बेवफा
 जिस रोज शीशा देखोगी,सुबह आँख तुम मलते हुये

Wednesday, February 27, 2008

याद इतना भी कोई ना आये हमें

दिल की नाजुक रगें तक लगें टूटने
याद इतना भी क्यों कोई आये हमें
 चैन दिन मे नहीं नींद रातों से गुम
इस तरह से कोई क्यों सताये हमें
 वो लगायेंगे मरहम,तसल्ली तो दें
 फिर भले जख्म रोज देते जायें हमें
 प्यार उनसे किया जुर्म हमसे हुआ
फिर सजा से कोई क्या बचाये हमे
 प्यार ही दर्द है तो ये भी मंजूर है
 कोई दर्द-ए-दवा ना पिलाये हमें
 उनकी राहों से चुनने है काँटे अभी
कोई फूलों की राह ना दिखाये हमे
 ये है कैसी गजल जिसके हर लफ्ज में
 यार का अक्स ही, नजर आये हमें
 रोज सपनों में आने से क्या फायदा
 कोई सपना तो सचकर दिखायें हमें

Saturday, February 23, 2008

शहर में शीशे का घर, भूल ना कर

चाहो तो, बुझा दो तुम, चिराग सब जलते हुये
 हमने देखा है , नये सूरज को निकलते हुये॥
 अब बता, कहाँ जायेगा, दरवाजा हर इक बन्द है।
कुछ तो सोचा होता, अपने घर से निकलते हुये॥
 ये हादसो का शहर है, तो होके रहेगा हादसा
लाख तुम रखना कदम, एक एक संभलते हुये
 राहों मे ,कान्टे हटा ,किसी राह को आसान कर
 गुजरना क्या गुलशन से हर इक फूल मसलते हुये
 इस शहर में,शीशे का घर,ये भूल ना करना कभी
 इस शहर मे दिखते हैं अक्सर ,पत्थर उछलते हुये
 खून उस अरमाँ का, होते देखूँ , ये मुमकिन नहीं
जिसे दिल के पालने मे, देखा बच्चे सा पलते हुये
 अब नहीं कहते कभी, किसी यार को हम बेवफा
 बस साथ शीशा रखता हूँ इस राह मे चलते हुये
 गिरगिट पे रंग बदलने का, इल्जाम ना आता कभी
 देखते इन्सां को गर, मौका बेमौका, रंग बदलते हुये
 क्या वफा क्या दोस्ती क्या प्यार क्या है अपनापन
 मौसम के साथ देखे , सबके मायने बदलते हुये

Thursday, February 21, 2008

मुझ से गुनाह हो गया

जिन्दगी मे जब कभी , मुझ से गुनाह हो गया
 हर शख्स इक इन्साफ पसन्द, शहँशाह हो गया
 बाप का साया जो मेरे सर से उठ गया तो फिर
देखो जिसे मेरे लिये, वो ही जहाँपनाह हो गया
 माँ की नजरों में सदा मेरा स्याह भी सफेद था
 बन्द वो आँखे हुई,और सफेद भी स्याह हो गया
 मेरी तबाही से तरक्की सबकी इतनी हो गयी
फकीर तक मेरे लिये कोई बादशाह हो गया
 मुँह लगा बोतल से पीते थे ये कल की बात है
 अब तो, बोतल देखना तक, भी गुनाह हो गया
 सजा का फैसला तो पहले ही से तेरे मन में है
क्यों पूछना कब, कैसे और क्या गुनाह हो गया
 जीत ही लेता मुकदमा तुझ से मै ये प्यार का
 पर दिल ही मेरा, देकर दगा, तेरा गवाह हो गया

Wednesday, February 20, 2008

प्यार तुम से और बढ़ता जा रहा है

वक्त ज्यों ज्यों गुजरता जा रहा है
प्यार तुम से और बढता जा रहा है
 सोचा था हालात की इस चिलचिलाती धूप में
मर जायेंगी मेरी ये सारी पौध जैसी हसरतें
पर जाने कौन किस्म है,इस पौध की या मेरे रब
प्यार का पौधा तो बेहिसाब बढ़ता जा रहा है
 वक्त ज्यों…………॥
 सोचा फिर अब कह ही दूँगा मुझ को तुमसे प्यार है
जीना क्या मरना भी अब तेरे बिना दुश्वार है
 पर जाने किस हद तक आ पहुंचा है मेरा प्यार अब
 कुछ भी कहना अब तो बेमानी सा होता जा रहा है
वक्त ज्यों…………
 अब ये सोचा है कि अब से कुछ भी ना सोचेंगे हम
तूँ ही बता, इस दिल को आखिर कितना और रोकेंगे हम
इसे रोकने में आजतक मिली किस को कामयाबियां
 मेरा दिल भी, अब तो बगावत पर उतरता जा रहा है
 वक्त ज्यों ज्यों गुजरता जा रहा है
प्यार तुम से और बढ़ता जा रहा है

Monday, February 18, 2008

सच मानो दुर्योधन नहीं मरा

जाने क्यों लगता है मुझ को कभी कभी
युद्ध महाभारत का नहीं हुआ है खत्म अभी
 (1) मन के इस कुरूक्षेत्र मैं आज भी इच्छा रूपी सेनाये,
 अपने अपने अस्त्र शस्त्र,हाथों में उठायें
 कर रही हैं शंखनाद ।
हर कोई एक दुसरे पर,बलवती होना चाहता है
 विजय सब को पसन्द है हारना कोई नहीं चाहता है ।
पर आज का विदुर इस बात से क्षुब्ध है,
 कि इस युद्ध का ना कोई नियम है ना धर्म,
ये कैसा महाभारत है, कैसा धर्म युद्ध है
 कभी भी ,कोई भी अस्त्र्, हो सकता है प्रयोग,
साम दाम दण्ड भेद या इन सब का योग
छल कपट मक्कारी या फिर बेईमानी
क्योंकि, अब युद्ध जीतना ही काफी है
 कैसे जीता, ये हो चुका है बेमानी।
 (2) जाने कयों लगता है मुझे,
 कि मन के इस 'कुरुक्षेत्र' मे ,
 मैं ही अर्जुन हूँ ,
तो मै ही दुर्योधन,
मैने स्वयं ही स्वयं को मारना है
या यूँ कहो, स्वयं ही जीतना है ,स्वयं ही हारना है
 मै अर्जुन , किंकर्त्वयविमूढ सा खड़ा समझ नही पाता
कि मैं भला स्वयं ही स्वयं को कैसे मार सकता हू
और स्वयं को जिताने के लिये, स्वयं कैसे हार सकता हूँ
 (3) तभी मैं स्वयं ही 'कृष्ण' बन जाता हूँ स्वयं ही स्वयं को समझाता हूँ
 कि यदि इस युद्ध मे 'दुर्योधन' नहीं मरा, तो अनर्थ हो जायेगा
पता नहीं ये दुर्योधन कब
,किस किस दुशासन से, किस कि्स द्रोपदी का 'शीलहरण' करवायेगा ।
 यह सोच ,मै अन्दर तक काँप जाता हूँ
क्योंकि द्रोपदी भी ,मै खुद को ही पाता हूँ
 (4) पर पिछले हर अनुभव से हतोत्साहित
, मुझ अर्जुन सेअपना गाण्डीव नहीं उठता
हे कृष्ण, मै ये युद्ध अब और नहीं कर सकता
अपना समय अपनी ताकत व्यर्थ नहीं कर सकता
आपके कहने पर मैने अक्सर अपना गाण्डीव उठाया है
 तर्क वितर्क का हर तीर भी आजमाया है
 पर हर बार नतीजा , वही ढाक के तीन पात ही आया है
दिल का 'ये' दुर्योधन ना कभी हारा ना मरा
इसे हमेशा जिन्दा ही पाया है
 हे कृष्ण
अगर इस तरह दुर्योधन , मर सकता या मर गया होता
 तो ये महाभारत कब का खत्म हो गया होता
 पर ये तो आज भी अपनी मनमानी करता फिरता है,
ना इस की 'सेना ' मरती है , ना ये आप ही मरता है
 इसलिये प्रभु मुझे अब क्षमा कीजिये
और हार स्वीकार कर युद्ध समाप्त करने की अनुमति दीजिये।
 (5) हे अर्जुन,
 ऐसा नहीं कि मैं कृष्ण ये बात नहीं जानता
 ये दुर्योधन नहीं मरने वाला मै ये भी हूँ मानता
 फिर भी ये युद्ध समाप्त करने की अनुमति मै नहीं दे सकता
 क्योंकि एक बात तूँ नहीं जानता।
 ये युद्ध मेरे द्वारा ही प्रेरित है।
और इस युद्ध को जारी रखने में ही हम सब का हित है
। हे अर्जुन ,
ना भी मरा दुर्योधन तो कम से कम इस युद्ध मे उलझा तो रहेगा
 और इस तरह तब तक कई 'द्रोपदियां 'बची रहेंगी,\
 'हस्तिनापुर' भी बचा रहेगा
 (6) तब मैं अर्जुन
, अनमने मन से ही सही, फिर गाण्डीव उठाता हूँ
 और 'महाभारत' अभी जारी है
इसका शंखनाद बजाता हूं

मन के इस कुरूक्षेत्र में

जाने क्यों लगता है , मुझ को कभी कभी युद्ध महाभारत का खत्म नही हुआ अभी (1) मन के इस कुरूक्षेत्र मैं आज भी इच्छा रूपी सेनाये, अपने अपने अस्त्र शस्त्र, हाथों में उठायें कर रही हैं शंखनाद हर कोई एक दुसरे पर, बलवती होना चाहता है विजय सब को पसन्द है हारना कोई नहीं चाहता है पर आज का विदुर इस बात से क्षुब्ध है, कि इस युद्ध का ना कोई नियम है ना ही कोई धर्म, तो ये कैसा महाभारत है कैसा धर्म युद्ध है कभी भी कोई भी अस्त्र्, हो सकता है प्रयोग, साम दाम दण्ड भेद या इन सब का योग छल कपट मक्कारी या फिर बेईमानी क्योंकि, अब युद्ध जीतना ही काफी है कैसे जीता, ये हो चुका है बेमानी। (2) और जाने कयों लगता है मुझे, कि मन के इस कुरुक्षेत्र मे , मैं ही अर्जुन हूँ ,तो मै ही दुर्योधन, मैने स्वयं ही स्वयं को मारना है या कहो, स्वयं ही जीतना है ,स्वयं ही हारना है मै अर्जुन , किंकर्त्वयविमूढ सा समझ नही पाता हूँ मैं भला स्वयं ही स्वयं को कैसे मार सकता हू और स्वयं को जिताने के लिये, स्वयं कैसे हार सकता हूँ (3) तभी मैं स्वयं ही कृष्ण बन जाता हू स्वयं ही स्वयं को समझाता हूँ यदि इस युद्ध मे दुर्योधन नहीं मरा, तो अनर्थ हो जायेगा पता नहीं ये दुर्योधन कब किस किस दुशासन से, किस कि्स द्रोपदी का 'चीरहरण' ही नहीं 'शीलहरण' तक करवायेगा । यह सोच , मै अन्दर तक काँप जाता हूँ क्योंकि द्रोपदी भी , मै खुद को ही पाता हूँ (4) पर पिछले हर अनुभव से हतोत्साहित, मुझ अर्जुन से अपना गाण्डीव नहीं उठता हे कृष्ण, मै ये युद्ध अब और नहीं कर सकता अपना समय और अपनी ताकत व्यर्थ नहीं कर सकता आपके कहने पर मैने अक्सर अपना गाण्डीव उठाया है तर्क वितर्क का हर तीर भी आजमाया है परन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात ही आया है दिल का 'ये' दुर्योधन ना हारा ना मरा इसे हमेशा जिन्दा ही पाया है हे कृष्ण अगर इस तरह दुर्योधन , मर सकता या मर गया होता तो ये महाभारत कब का खत्म हो गया होता पर ये तो आज भी अपनी मनमानी करता फिरता है, ना इस की सेना ही मरती है , ना ये आप ही मरता है इसलिये प्रभु मुझे अब क्षमा कीजिये और हार स्वीकार कर युद्ध समाप्त करने की अनुमति दीजिये (5) हे अर्जुन, ऐसा नहीं कि मैं कृष्ण ये बात नहीं जानता और ये दुर्योधन नहीं मरने वाला , मै ये भी हूँ मानता फिर भी ये युद्ध समाप्त करने की अनुमति मै नहीं दे सकता क्योंकि एक बात तूँ नहीं जानता। ये युद्ध मेरे द्वारा ही प्रेरित है, और इस युद्ध को जारी रखने में ही हम सब का हित है सोच ना भी मरा दुर्योधन तो कम से कम इस युद्ध मे उलझा तो रहेगा और इस तरह तब तक कई द्रोपदियां बची रहेंगी, हस्तिनापुर भी बचा रहेगा तब मैं अर्जुन, अनमने मन से ही सही, फिर गाण्डीव उठाता हूँ और 'महाभारत अभी जारी है' इसका शंखनाद बजाता हूं

Thursday, February 14, 2008

रैड रोज़ और 'वो'

पैरों से मसलोगी या फिर चूमोंगी होठों से उसे
भेजा तो है हमने तुझे इक गुलाब अभी अभी
सबसे सुर्ख रेड रोज मेरा हो ये सोच कर
खूने जिगर से उसको सींचा था कभी कभी
 उस फूल मे दिल भी मेरा आये तुझे नजर
 दिल के लहू से गुलाब ये रंगा है अभी अभी
 ता उम्र बदली करवटें ना नींद थी न ख्वाब थे
 लगी आँख तो दिखा है तेरा ख्वाब अभी अभी
 ता उम्र मिले जख्म, और अब जाके तुम मिली
 खुदा ने किया चुकता मेरा हिसाब अभी अभी
 बन के सवाल सारी उम्र जो उलझाता रहामुझे
 मिलने से तेरे मिल गया वो जवाब अभी अभी
 समझेंगे अब है प्यार क्या और होती है क्या वफा
लगी हाथ अपने है प्यार की इक किताब अभी अभी

Wednesday, February 13, 2008

सफर का अन्त

कितनी तकलीफ हुई होगी, उस शख्स को, तुम सोचो तो जरा
 जिसे सफर के अन्त में पता चले , वो जितना चला बेकार चला
मन्जिल हो अभी भी दूर खड़ी , और खत्म हुआ जिसका रस्ता
मन्जिल ने हो जिस राही से कहा, नादान, तूँ नाहक दौड़ा किया
मुझ तक कोई राह नहीं आती , तूँ मुझ तक पंहुच नहीं सकता
 मेरे चारों और मीलों खाई, नहीं जिसको लाँघ कोई पाता
 राही भी अजब दीवाना था , अपनी धुन में मस्ताना था
उस राही ने मन्जिल से कहा, काहे को रही इतना इतरा
 जिस हद तक आता था रस्ता, उस हद तक तो मैं आ पंहुचा
तुम चाहती अगर, बाकी दूरी ,पल भर में ही मिट सकती थी
इक कदम बढ़ाना था तुमको, मुझको मन्जिल मिल सकती थी
 लेकिन तुमने चाहा ही नहीं, और मेरे चाहने से होना था क्या
आगे का सफर संभव ही नहीं , ना तुम चाहो , ना चाहे खुदा
, आया तो बड़ी चाहत से था मैं, पर, अन चाहे मन लौट चला
 फिर भी तेरे जीवन में कभी इतना सूना पन आ जाये
ना राह दिखे ना राही ही , और तूँ खुद से घबरा जाये
 तब अहम किनारे पे रखना , इक बार पुकारना धीरे से
उस रोज भी तेरा दिवाना , तेरे आसपास मिल जायेगा
वीरान पड़ी तेरी राहों का, फिर से राही बन जायेगा
आखिर तो तेरा दीवाना है , कहाँ तुझ बिन जान गंवायेगा

सफर का अन्त

कितनी तकलीफ हुई होगी, उस शख्स के बारे में सोचो जिसे सफर के अन्त में पता चले , वो जितना चला बेकार चला मन्जिल हो अभी भी दूर खड़ी , और खत्म हुआ जिसका रस्ता मन्जिल ने हो जिस राही से कहा , नादान तूँ नाहक दौड़ा किया मुझ तक कोई राह नहीं आती , तूँ मुझ तक पंहुच नहीं सकता मेरे चारों और मीलों खाई, कोई जिसको लाँघ नहीं सकता तब राही ने मन्जिल से कहा, काहे को रही इतना इतरा जिस हद तक आता था रस्ता, उस हद तक तो मैं आ पंहुचा तुम चाहती तो बाकी दूरी पल भर में ही मिट सकती थी इक कदम बढ़ाना था तुमको, मुझको मन्जिल मिल सकती थी लेकिन तुमने चाहा ही नहीं, और मेरे चाहने से होना था क्या आगे का सफर संभव ही नहीं, ना तूँ चाहे ना चाहे खुदा ओ के टा टा बाई बाई , तेरी राहों का राही लौट चला फिर भी तेरे जीवन में कभी इतना सूना पन आ जाये ना राह दिखे ना राही ही , तूँ खुद से भी घबरा जाये तब अहम किनारे पे रख के, इक बार पुकारना धीरे से उस रोज भी तेरा दिवाना , तेरे आसपास मिल जायेगा वीरान पड़ी तेरी राहों का, फिर से राही बन जायेगा आखिर तो तेरा दीवाना है , तुझ बिन ये कहाँ और जायेगा

Monday, February 11, 2008

इजहार-ए-इश्क ना होने वाली वैलेन्टाईन से

हमने किया इकबाल-ए-जुर्म और आपने दे दी सजा अच्छा किया अब इसमे तेरी क्या खता इतिहास है इसका गवाह इससे ज्यादा हुस्न ने है कब किसी को कुछ दिया आपने जो दी सजा यूँ तो हमें कबूल है लेकिन तूँ दिल पे हाथ रख और फिर बता इजहार-ए-इश्क करना क्या कोई इतनी बड़ी भूल है अपनी कब चाहत रही कि गुलशन पे हम कब्जा करें कब जताया हमनें हक कि तुझसा सुन्दर फूल मेरे चमन का फूल है हाँ हमको ये पता ना था कि गुलशन के आसपास भी अपना निकलना है मना किसी फूल की महक भी उसको सूंघने का हक नहीं जिसके जीवन में मुकद्दर ने लिखे बस शूल हैं बस अब इतना कहना है मुझे कि अपना भी इक उसूल है दोहराते हम कभी नहीं जब भी हुई कोई भूल है इस बार क्या कभी जिन्दगी में वैलेन्टाईन मनायेंगे नहीं और अपनी तो तूँ छोड़ किसी और के आगे भी हम वैलेन्टाईन बनने के लिये हाथ फैलायेंगे नहीं

Saturday, February 9, 2008

आओ वैलेन्टाईन मनायें

कुछ और बने ना बने हम से चलो किसीको वैलेन्टाईन बनायें कोई और त्योहार मने ना मने सब मिलकर वैलेन्टाईन मनायें वैश्वीकरण के दौर में शायद कुछ भी नहीं बचेगा अपना अपनी संस्कृति अपनी सभ्यता बन्द कर अब ये मन्त्र जपना आज की पीढी इन्हें समझती किसी बीती रात का झूठा सपना अब तूं भी निकल सपनों से बाहर चल वैलेन्टाईन कोई ढूंढ के लायें कोई और त्योहार मने ना मने सब मिलकर वैलेन्टाईन मनायें अपने त्योहारों में क्या है वैलेन्टाईन तो नया नया है होली में हुड़दंग से ज्यादा क्या रखा है तू ही बता सब के चेहरे गंदे करना और भला होता है क्या और दिवाली में भी अक्सर ये ही तो है देखा जाता इधर बम तो उधर पटाखा रात रात भर बजता जाता प्रदूषण बढ जाता इतना नहीं ठीक से, कोई सो पाता इसी तरह, अपने त्योहारों में कुछ और कमियां ढूंढ के लाओ कुछ मै तुम को बतलाता हूँ और कुछ तुम मुझ को बतलाओ कमियां दूर नहीं होनी, कह अपने त्योहारो को छोड़ो वैलेन्टाईन जैसे पश्चिम के त्योहारों से नाता जोड़ो अब बजने दो संगीत पश्चिमी चलो हम भी गीत पश्चिमी गायें कुछ और बने ना बने हम से चलो किसी को वैलेन्टाईन बनायें कोई और त्योहार मने ना मने आओ मिलकर वैलेन्टाईन मनायें

Friday, February 8, 2008

वेलेन्टाईन की तलाश है

पहले तो कभी भी हुआ नहीं इस बार शायद कोई बात बने मै किसी का वैलेन्टाईन बनूँ कोई मेरी वैलेन्टाईन बने जीवन की इस भाग दौड में सबसे आगे बढने की होड़ मैं वक्त नही है पास किसी के जो कोई थामे उसका हाथ छोड़ गये अपने बेगाने जिस बदकिस्मत इन्साँ का साथ मैं चाहूँ कि ऐसे ही किसी शख्स की जो कोई बात सुने मैं उसका वैलेन्टाईन बनूँ वो मेरी वैलेन्टाईन बने तन्हाई क्या होती है और दर्द है क्या तन्हाई में इस दर्द को बस वो ही जाने कुछ दिन जिसके गुजरे हों तन्हाई में घर की चार दीवारों से ही जिसकी रिश्तेदारी हो बिस्तर से हो दोस्ती जिसकी बस सिरहाने से यारी हो तुम्हें अगर मिल जाये जो हो इतना तन्हा जीवन मे कहना उससे दिन सात गिने मैं बनूँगा उसका वैलेन्टाईन वो मेरी वैलेन्टाईन बने लेकर बस हाथो में हाथ बैठे रहें चन्द घंटो साथ और भले कुछ हो ना हो पर मन से हो कोई मन की बात मैं उसके दिल की बात सुनूँ वो मेरे दिल की बात सुने मै उसका वैलेन्टाईन बनूँ वो मेरी वेलेन्टाईन बने

Thursday, February 7, 2008

गैरत ज्यादा दिन बचे , मुमकिन नहीं

आप क्या महफिल में आये, उठके सब चलने लगे चिराग कुछ बुझने लगे , जिस्म कुछ जलने लगे ज्यादा पीकर के बहकते, तो कुछ समझ आता हमें पर आप तो दो चार घूँट, पीकर ही बहकने लगे कातिल नशा है शराब में या है साकी तेरे शबाब में उसे पी के खोये होश तो , तुझे देख सब मरने लगे है कैसी ये शराब और महफिल का साकी कैसा है ना पी तो लड़खड़ाये सब और पी तो संभलने लगे मेरी ना को तूँ ना ही समझ ये कोई झूठीमूठी ना नहीं हम वो नहीं जो इसरार से ना को हाँ मे बदलने लगे मेरी सोई गैरत को, उस दिन, ललकारा उसने इस तरह ना चाह कर भी प्यासे ही मह्फिल से हम चलने लगे प्यासा भी है रहना पड़ा ,और खाली भी लौटे है बहुत महफिल के सब दस्तूर, साकी, मुझपे अमल करने लगे उसकी गैरत ज्यादा दिन बच पाये ये मुमकिन नहीं जिस जेब में दौलत ना हों और प्यास भी बढने लगे

Wednesday, February 6, 2008

महक

चाँद और तारों की ख्वाहिश, दिल मे क्यों पलने लगे ये दिल कोई बच्चा नहीं जो हर शै को मचलने लगे महक चारों ओर है और गुलशन का कुछ पता नहीं लगता है फूल आजकल हैं दिल मे मेरे खिलने लगे हम किसी भी महक के कायल नहीं थे आजतक ये कौन सी है महक जिससे हम हैं विचलने लगे सुराग तक उस महक का मिलता नहीं ढूंढे से भी मन जिससे महकने लगा दिल-ओ-जिस्म फिसलने लगे आप का कहना है वाजिब नहीं देखने की शै महक मै क्या करूँ जो देखने को दिल ये मचलने लगे हाँ पहले की तरह मैं अब, करता नहीं इजहारे-इश्क आईना देखा है जब से, मेरे होंठ हैं सिलने लगे आज तो सब रास्ते , मुझे बन्द आते हैं नजर शायद कल दिल की गली से, रस्ता निकलने लगे पर पिछले अरमानों का हश्र देखते तो फिर कभी ना पलते ये अरमां नये, जो दिल में हैं पलने लगे ये तो है महक , इन मुठिठयों मे कैद होने की नहीं नाहक इसे क्यों फूल समझ, कोई हाथ मसलने लगे

Tuesday, February 5, 2008

किस तरह गुजरे ये दिन तेरे बिन

ना पूछ मुझसे किस तरह गुजरे हैं मेरे दिन तुझसे मिले बिना या तुझसे बात किये बिन ज़ालिम लहर जैसे कोई मछली किनारे पटक गयी अगली लहर तक जान मछली की अधर मे लटक गयी तड़फड़ाती, छटपटाती, मरती जा रही थी वो चाह कर भी पानी तक ना पहुंच पा रही थी वो महसूस कर सके तो कर सोच पाये तो तूँ सोच किस तरह के दर्द से गुजरती जा रही थी वो जैसे मरीज-ए-सांस का हो वक्त बुरा आ गया मुंह से मास्क-आक्सीजन कोई जिसके हटा गया एक एक सांस के लिये, छटपटा रहा था वो अनचाही मौत की तरफ खिसकता जा रहा था वो हो सके तो कुछ तो उस पीड़ा को तूँ महसूस कर जिस पीड़ा के दौर से गुजरता जा रहा था वो मह्सूस कर सके तो कर ना कर सके तो सुन कुछ इस से भी बदतर हैं गुजरे मेरे रात दिन तुझसे मिले बिना और तुझसे बात किये बिन ए मेरी जानेमन, मेरी जाने मन, मेरी जानेमन वक्त का इक इक मिनट है यूँ गुजरता जा रहा नंगे बदन पे मोम ज्यों कोई कतरों में टपका रहा दर्द का एक एक लम्हा इस कदर लम्बा हुआ सदियों की सजा वक्त कुछ पल मे है देता जा रहा बस एक बात सोच कर मै दर्द सह गया सभी शायद रहम आजाये और मरहम लगाये तूँ कभी उस इक स्पर्श के लिये मै हजार जान भी वार दूं मै जहाँ की सह लूँ नफरतें, करे एक बार जो प्यार तूँ

Monday, February 4, 2008

ये शहर कब्रिस्तान बनता जा रहा है

उपयोगिता तय करती है अब रिश्तों की नजदीकियां आदमी भी आजकल सामान बनता जा रहा है व्यक्तितव से ज्यादा महत्व उपयोगिता का हो गया कद नापना इन्सान का आसान बनता जा रहा है देख कर इन्सान का इन्सान बन पाना कठिन जिसको देखो आजकल भगवान बनता जा रहा है लोग कहते है कि उसके दर पे है मिलता सकून मेरे अन्दर फिर ये क्यों तूफान बनता जा रहा है किस के सिर पे पांव रख अब आगे बढेगा तूँ बता धरती का हर टुकड़ा जब आसमान बनता जा रहा है कल जहाँ कुछ भी ना था वहाँ आज छत तैयार है शायद बिना बुनियाद के मकान बनता जा रहा है
खून का रिश्ते तो अब पानी से पतले हो गये
खून इक मिटती हुई पहचान बनता जा रहा है
पहले जो कदमों की आहट तक से था पहचानता अब वो मेरी शक्ल से अन्जान बनता जा रहा है
ताकि उसकी इनायतों को भूल ना जाऊं कहीं जख्म भर चला है पर निशान बनता जा रहा है
जी हाँ कभी ये शहर था फिर जाने क्या चली हवा अब जिन्दा लाशों का ये कब्रिस्तान बनता जा रहा है

Wednesday, January 30, 2008

मेरे मन दर्पण पे तूने फैंके हैं पत्थर

जिन्दगी ने कल हमें फिर और इक सदमा दिया वक्त ने फिर हम पे बन्द इक और दरवाजा किया जिसकी नजरों में, तमन्ना थी कि मेरा कद बढे उसकी नजरों में गिरा के मुझ को शर्मिन्दा किया दोस्त दुश्मन दोनों का हक वक्त ने यूँ अदा किया पहले मिलाया और फिर मिलते ही उससे जुदा किया जिन्दगी से जब भी कुछ उम्मीद पाने की जगी वक्त ने लाकर हमें फिर आईना दिखला दिया क्या मुकद्दर है मेरा और क्या मेरी तकदीर है सामने थाली रही और अन्दर निवाला ना गया ऐसा क्यों होता है मेरे साथ ही होता है क्यों जितना मै आगे बढा यार उतना पीछे चला गया नाकामियां बदनामियां कुछ और दामन में जुड़ी जब भी कोई दाग कम करने का हौंसला किया लोगों का कहना भला मुझको लगेगा क्यों बुरा जब मेरा जमीर ही मुझको खरी सुना गया जब इनायतों से ज्यादा यार की हों शिकायते तो समझ लो कि यारी टूटने का वक्त आ गया हर शख्स ही मुझ से बड़ा दिखने लगा है आजकल वक्त मेरे कद को इस हद तक बौना बना गया मेरे मन दर्पण पे तूने फैंके तो हैं पत्थर, मगर टूटने से पहले उस मे अक्स तेरा समा गया दीवानगी की देख हद खुद टूट कर भी शीशा दिल अपने हर टुकडे मे तेरा अक्स पूरा बचा गया

Monday, January 28, 2008

कहने को साथी साथ है

पास तेरे आके तुझ से दूर हो जाता हूँ मै क्या बताऊं किस कदर मजबूर हो जाता हूँ मै मिल के भी तुझ से कभी मिल नहीं पाता मै जब ये समझ आता नहीं फिर मिलने क्यों आता हूँ मैं बात कर सकता हूँ पर हर बात कर सकता नहीं जाहिर तुम पे मै कोई जज्बात कर सकता नहीं पर दूर तुझसे रहके तेरे पास आ जाता हूँ मै अपनी मनमर्जी का मालिक खुद को तब पाता हूं मै ना इजाजत चाहिये ना पूछनी मर्जी तेरी जी में जो आता है सब बेखौफ कर जाता हूँ मै पास तेरे रहके तुझ को छूना तक मुमकिन नहीं पर दूर तुझ से रह तेरी बाहों में आ जाता हूँ मै दिलका हर इक दर्द तब तुझसे मै बांट पाता हूँ मन की हर इक बात तब तुझ से कर जाता हूँ मैं अठखेलियां करना भी तब तुझको बुरा लगता नहीं पास में और दूर में कितना फर्क पाता हूँ मैं तूँ ही बता कि पास तेरे आके मुझ को क्या मिला दूर तुझसे रह के फिर भी कुछ तो पा जाता हूँ मै नजदीक रहके इस कदर रखनी क्या इतनी दूरींया कहने को साथी साथ है और तन्हा हो जाता हूँ मै

Friday, January 25, 2008

हदों मे रह के कभी प्यार हो नही सकता

हदों मे रहके तो व्यापार होते आयें हैं हदों में रहके कभी प्यार हो नही सकता हदों में रहके तुम इन्कार कर तो सकते हो हदों में रहके पर इकरार हो नहीं सकता तूँ जिस तरह से किनारे को पकडे बैठा है आज क्या तूँ कभी उस पार हो नहीं सकता जो अपने यार की उम्मीद पे ना उतरे खरा वो रिश्तेदार ही होगा वो यार हो नही सकता खोने और पाने का हिसाब जब लगे लगने तो फिर वो दोस्ती होगी वो प्यार हो नहीं सकता अगर पाना है मंजिल को तो घर को छोडना होगा कैदी दीवारों का मंजिल का हकदार हो नही सकता निकलना दायरों से तेरा लाजिम है तूँ मेरी मान रह के दायरों मे तूँ मेरा प्यार हो नहीं सकता रिश्तों में हदें होती हैं नहीं प्यार में होती हदों में रिश्ते निभ सकते हैं प्यार हो नहीं सकता खुले आकाश मे उडना अगर चाहत है तो सुन ले हदों के पिंजरे मे रहके ये मुमकिन हो नहीं सकता निकल जाती है गाडी सामने से उस मुसाफिर के जो रहते वक्त गाडी मे सवार हो नहीं सकता मेरे तन मन पे तो अधिकार तेरा , सिर्फ तेरा है भले तुझ पर यही अधिकार मेरा हो नहीं सकता

प्यार जब हद से गुजर जाये

प्यार में दर्द का अहसास ही कब होता है प्यार जब आधा अधूरा हो ये तब होता है दर्द जब हद में रहे तब ये रूलाता है बहुत दर्द जब हद से गुजर जाये दवा होता है प्यार तड़पाता,रुलाता है,सताता है बहुत लेकिन वो प्यार जो दायरों मे घिरा होता है प्यार जब हद से गुजर जाये तो फिर क्या कहना प्यार में सारे जमाने का मजा होता है प्यार में रोने रूलाने का चलन है तब तक जब तक ये अपनी जंजीरो मे बंधा होता है अपने संस्कारो की जंजीरे जरा तोड़ के देख अपने दायरों से निकल अहम जरा छोड़ के देख प्यार करते हो तो सरेआम कहो करते हैं यार से साफ कहो तुम पे बहुत मरते हैं अपना कोई भी अहम तूँ आड़े ना आने दे कभी प्यार को तूँ रूठ के ना दूर जाने दे कभी खा कसम डर या वहम दिल मे ना तेरे आयेगा तूँ कदम आगे बढा पीछे जहाँ ह्ट जायेगा हाँ हो सकता है कि कुछ चर्चे रहें दो चार दिन तूँ ही बता इससे ज्यादा और क्या हो जायेगा थोडी ताकत थोड़ी सी हिम्मत जुटानी है तुम्हें ये प्यार तेरी सारी दुनियां ही हसीं कर जायेगा वो कहेगा कब कहेगा इसका ना इंतजार कर तुम कहोगे पहले तो इसमें तेरा क्या जायेगा तेरे दामन के पकड़ने में ही दिखती ढील है वरना क्या हिम्मत जो वो दामन छुड़ा ले जायेगा

Thursday, January 24, 2008

तब जा के गुजारा होता है

जो भी चाहे तूँ मंजिल चुन जो भी चाहे तूँ सपने बुन जो ठीक लगे सो करता जा ना इसकी सुन ना उसकी सुन सब कुछ हासिल हो सकता है गर खुद मे तूँ पैदा कर ले मंजिल को पाने की धुन और राहो पे चलने का गुण ना कामयाब इन्सान सदा किस्मत का ही रोना रोता है कहता है मिलता है वही किस्मत में जो लिखा होता है नहीं सोचता आम मिले कैसे जब पेड बबूल के बोता है अपने कर्मो का फल ना मिले ऐसा तो कभी नहीं होता है केवल इच्छा है पाने की नहीं हिम्मत दाँव लगाने की हाँ ऐसा शख्स तो हर बाजी पहले से ही हारा होता है चाहत रखने भर से ही मंजिल कहाँ किसे मिलती मंजिल के लिये तो चलते रहो तब जा के गुजारा होता है

Monday, November 26, 2007

मृगतृष्णा

मृगतृष्णा किसी और का कोई दोष नही, बस मेरी ही नादानी है
 जाने मै कैसे भूल गया मेरा सफर तो रेगिस्तानी है
 इन रेतीली राहो में सदा सूरज को दहकता मिलना है
 बून्दों के लिये यहाँ आसमान को तकना भी बेमानी है
 बदली के बरसने की जाने उम्मीद क्यों मेरे मन में जगी
 यहां तो बदली का दिखना भी , खुदा की मेहरबानी है
 यहाँ रेत के दरिया बहते हैं कोई प्यास बुझाएगा कैसे
प्यासे से पूछो मरूथल में किस हद तक दुर्लभ पानी है
यहाँ बचा बचा के रखते हैँ सब अपने अपने पानी को
 यहाँ काम वही आता है जो अपनी बोतल का पानी है
 पानी पानी चिल्लाने से यहाँ कोई नहीं देता पानी
प्यासा ही रहना सीख अगर तुझे अपनी जान बचानी है
मृगतृष्णा के पीछे दोड़ा तो दौड़ दौड़ मर जायेगा
 पानी तो वहाँ मिलना ही नही, बस अपनी जान गंवानी है
 इसे प्यासे की मजबूरी कहूँ या चाह कहूँ दीवाने की
जब जानता है मृगतृष्णा है क्यों मानता है कि पानी है
 अब इस में तेरा दोष कहाँ , मेरी ही तो नादानी है
 तुम भी तो थी मृगतृष्णा ही मैनें समझा कि पानी है

Friday, November 23, 2007

सुन्दरबन

सुन्दरबन जाने का एक बार मौका मिला। वहाँ मैन्ग्रोव के वृक्ष बहुत अधिक हैं। हरियाली इतनी कि हरे रग के अलावा कुछ नज़र नहीं आता। वहाँ की छटा का जो मेरे मन पर प्रभाव पड़ा उसका इस कविता में कुछ चित्रण करने का प्रयास किया है। "सुन्दरबन" ये चलते चलते नाव लेके आ गई कहाँ धरती पे कैसे बन गया इक स्वर्ग सा जहाँ कुदरत के रंग देख कर मैं दग रह गया मानो जहाँ में सिर्फ हरा रंग रह गया रंग एक रूप एक बढने की इक रफ्तार है नख से ले कर शिख तलक हर वृक्ष एकसार है इतने सलीके से हसीना ज़ुल्फें भी संवारे ना जितने सलीके से हज़ारों वृक्ष हैं उगे यहाँ किस कदर सज सकती है बस एक रग से दुल्हन देखना हो गर किसी को आके देखे "सुन्दरबन"

Friday, November 16, 2007

आम आदमी

कल
एक सज्जन मेरे घर आये
बोले तुम्हारी मदद की दरकार है
मेरे पास एक कविता तैयार है
बड़ी मुश्किल से लिख पाया हूँ
कहीं छपवा दो इस लिये तुम्हारे पास आया हूँ
मैने पूछा ये कविता लिखने की बात तुम्हारे दिमाग में कैसे आई
बोला बात इतनी है भाई
मैने इन कवियों के लिये कविता है बनाई
तुम चाहो तो इसे तुकबन्दी कह सकते हो
लेकिन इसे छपवा दो मेरे भाई
ये मेरे भले बुरे की अकारण सोचते रहते हैं
मैं चाहुँ ना चाहुँ मेरा मार्गदर्शन करने मे लगे रह्ते है
ना चैन से रहने देते है ना खुद रहते है
अपना समय लिख कर और मेरा पढने मे व्यर्थ करते है
शायद मेरी ये कविता पढ कर इनकी समझ में आये
कि सुखी जीवन का एक ही है उपाय
कोई किसी के जीवन मे टाँग ना अड़ाये
बस इन से मुझे इतना ही है कहना
कि ये हमें हमारे हाल पे छोड़ दें
और अपनी कविताऔ का रुख हमारी ओर से हटा, अपनी ओर मोड़ लें
माना कि इन्हें लिखना आता है
पर इससे इनको
दूसरो पर टीका टिप्प्णी का अधिकार
कहाँ से मिल जाता है
सच मानो हम इन से बेहतर ही रहते हैं
और वो सब पहले से ही जानते है जो ये कहते हैं
मैने कहा मेरी मानो तुम अपने घर जाओ
बेहतर है ये कविता ना छपवाओ
ये कवि सिर्फ कहना जानते है
सुनना इन की आदत में नही
इन्हें कुछ भी कहो तो बुरा मानते हैं
ये तो दूसरों को सीख देना ही अपन धर्म मानते हैं

ये और बात है कि ये खुद कितना जानते हैं
इनका ,समझदारी से, बस इतना ही है नाता
इन्हें अपने अलावा कोई समझदार नज़र नहीं आता
क्यों ततैयों के छत्ते मे हाथ देते हो
इनको छोड़ो "आम आदमी" के बारे मे लिखो
अगर कुछ लिख लेते हो
बात उसकी समझ में आई
खुद उठा , अपनी कविता उठाई
लेकिन जब उसने पीठ घुमाई
मैने कहा ये तो बताते जाओ
तुम कौन हो भाई
मेरी ओर बिन देखे बोला
"आम आदमी"