Tuesday, November 30, 2010

वफा के नाम पे अब कुछ नही होता हासिल

आप कहते हो कि गम को ना छुपाया कीजे
ना सही हमको किसीको तो बताया कीजे

गम छुपाने का किसे शौक है पर ये तो बता
 है भला कौन यहाँ जिस पे भरोसा कीजे

 लोग कहते हैं कि गम बांटो तो घट जाता है
 वो गलत कहते हैं जब चाहो ये अजमा लीजे

हैं तमाशाई सभी कोई मददगार नहीं
बताके गम का तमाशा ना बनाया कीजे

दर्दे मरीज करहाता रहा करहाता रहा
देखने वाले रहे कहते कि धीरज कीजे

ये जो हमदर्दी है नाटक है दिखावा है सिर्फ
अपना बोझ अपने ही कंधो पे उठाया कीजे

प्यार का नाम है बस नाम है इस दुनिया में
प्यार व्यापार नही जो सोच समझ कर कीजे

वफ़ा के नाम पे अब कुछ नही होता हासिल
बेवफाई ना करे कोई तो फिर क्या कीजे

बाद मरने के भी क्यों  बोझ किसी पे बनना
अपनी लाश अपने ही कन्धो पे उठा भी लीजे

सिवा सलाह यहाँ किसने किसी को क्या दिया
 मदद के वास्ते झोली ना फैलाया कीजे

Friday, November 26, 2010

तेरा पहलु से उठ जाना कभी अच्छा नही लगता

खुदा तकलीफ तेरी कम अगर करता भी तो कैसे
यूं भी तकलीफ होती है यूं भी तकलीफ होती है

 तेरा पहलु से उठ जाना कभी अच्छा नही लगता
 बना के दूरियां बैठो तो भी तकलीफ होती है

 किसी का जब मरा कोई तसल्ली दी तसल्ली दी
मगर मरता है जब अपना बहुत तकलीफ होती है


 यहाँ रिश्तो के मरने की कोई परवाह नही करता
 फिर रिश्तेदार मरने पे कहाँ तकलीफ होती है

 तेरा आना ना आना एक सा अब तो लगा लगने
 वो भी तकलीफ देता है यूँ भी तकलीफ होती है

 तेरा दामन कोई पकडे तो क्या जाने क्या हो जाए
 तेरा कोई नाम भी लेले तो भी तकलीफ होती है

ना जाने किस कदर तू दिल के हर कोने आ पहुंचा
 भुलाऊं या करूं तुझे याद बहुत तकलीफ होती है

Monday, August 23, 2010

ये दुनिया है यहाँ पर लूटना फितरत है इंसां की

किसी ने मार के लूटा किसी ने प्यार से लूटा
गरज ये है कि हम को तो सारे संसार ने लूटा

 उसकी हाँ और ना दोनों का मकसद लूटना ही था
कभी इनकार से लूटा कभी इकरार से लूटा

हमारा हक़ था फिर भी न ही सुनने को मिली अक्सर
 कभी हाँ भी अगर की तो उसके इकरार ने लूटा

ये दुनिया है यहाँ पर लूटना फितरत है इन्सां की
अगर दुःख है तो बस इतना कि हमको यार ने लूटा

गिला गैरों से क्या कीजे लगे जब लूटने अपने
हर नातेदार ने लूटा हर रिश्तेदार ने लूटा

अगर पतझड़ में खुशियाँ लुट गयी होती तो क्या गम था
 गिला किस से करे जिसको सदा बहार ने लूटा

 खुदा का शुक्र ना कीजे तो फिर बतलाओ क्या कीजे
 बनाया जिसने इस लायक हमें संसार ने लूटा

Thursday, August 19, 2010

किसको बेवफा कहें और कहे तो किस लिए

किस लिए हैरां हो तुम यारों ये नया दौर है
 कहने की बात और अब करने की बात और है

 किस को बेवफा कहे और कहें तो किस लिए
यहाँ वो ही वफ़ादार है जिसका न चलता जोर है

सारे रिश्ते इक कटी पतंग जैसे हो गये
कट गयी पतंग, बची हाथ में बस डोर है

 जिस को देखो उसके माथे पर पसीना आ रहा
 ऐसा लगता है सभी के दिल में कोई चोर है

इश्क देखो गिरते गिरते कौन हद तक आ गिरा
सुबह बाहों में और तो , शाम को कोई और है

यारों ये नया दौर है, यारों ये नया दौर है

Saturday, April 10, 2010

परवाना खुद शमा की लौ पे जल मरा कोई क्या करे

क्यों नही समझता तू दर्द को मेरे कभी
क्यों समझता है कि मेरे सीने मे कोई दिल नहीं
क्यों मरा कैसे मरा चाहे जिस पे इल्जाम दे
पर सच बता हमदम मेरे क्या तू मेरा कातिल नहीं
खुद खुशी पाई ना आंचल तेरे खुशियां भर सका
बेमेल प्यार से किसी को कुछ हुआ हासिल नहीं
परवाना खुद शमा की लौ पे जल मरा कोई क्या करें
शमा तो परवाने की हुई कैसे भी कातिल नहीं
तेरे चाहने वालो की कतार हो पर ऐसा भी हो
तू जिसे चाहे सिवा मेरे कोई शामिल नहीं
बजता नहीं सुर से तो कोई और साज थाम ले
यूं साज ए दिल का तार तार तोडना कोई हल नहीं
हौले हौले यादे खुद दिल मे वो इतनी भर गया
अब शिकायत उसको मै क्यों भूलता इक पल नहीं

Thursday, April 8, 2010

ऐसे भी तड्पाता है कोई यार अपने यार को

या तो वक्त से कहो रोके अपनी रफ्तार को
या मना लाये वो जाके रूठे हुये यार को
हर सांस पे लगता है ये अब थमी कि तब थमी
ऐसे भी तड्पाता है कोई यार अपने यार को
या तो खुद आओ या सांसो से कहो कि आये ना
कोई तो राहत मिले इस इश्क के बीमार को
और दर्द और जख्म हमको वो हर शख्स दे गया
जान के राहत ए मरहम अपनाया निसके प्यार को
कडवा हुआ लेकिन चलो ये भी तजुरबा हो गया
क्या सिला मिलता है इस जहा मे सच्चे प्यार को
खुद ही अपना सिर कत्लगाह जाके हमने रख दिया
अब दोष क्या देना नाहक कातिल को या तलवार को
ना बचा अहसास ना विश्वास तो फिर क्या बचा
छाती से क्यों चिपकाये रखें फिर मरे हुये प्यार को

Tuesday, April 6, 2010

यार जब दिल मे कोई बस जाये तो क्या कीजीये

यार जब दिल मे कोई बस जाये तो क्या कीजीये
दिन रात वो ही याद जब आये तो क्या कीजीये
लोग माहिर हैं भुला देने मे अपने प्यार को
हम से इस तरह ना भूला जाए तो क्या कीजीये
दिल दिया है उसको तो हम जान भी देंगे उसे
इन्तजार उससे ना हो पाये तो क्या कीजीये
धीरे धीरे प्यार दिल मे खुद ही तो उसने भरा
उनके बिंन अब रहा ना जाये तो क्या कीजीये
जो ना हो सकती था हम वो बात करने चल पडे
वो बात अब हमसे नही बन पाए तो क्या कीजीये
कहने को कह्ते है वो ये विश्वास है हम पे बहुत
हर बात पे करते हैं शक तुम ही कहो क्या कीजीये

Saturday, April 3, 2010

यार को हम बीच राह छोड दे मुमकिन नही

या तो वक्त से कहो रोके अपनी रफ्तार को
या कही स ढूंढ़ लाये जाके मेरे यार को
यार को हम बीच राह छोड दे मुमकिन नहीं
इससे तो बेहतर है ये हम छोड दे सन्सार को
दिल में किसीके बीज शक का अकुरित जब हो गया
दिन बचे क्या बाकी फिर दम तोडने मे प्यार को
आन्धी ना तूफान फिर नैया लगी क्यों डोलने
माझी छोड वैठा है विश्वास की पतवार को
जब किया फूलो ने दामन को किया मेरे तार तार
दोष नाहक ही दिये ता उम्र हमने खार को
डूबता ना गर तो फिर और हो सकता था क्या
नैया से उतरा किनारा समझ वो मझधार को

Saturday, March 6, 2010

इसके बाद शायद ना लिखु शायद ना लिख पाऊं

इसके बाद शायद ना लिखु शायद ना लिख पाऊं
सोचा चलते चलते आखिरी रचना लिखता जाउं
अपने अपने मापदण्ड खुद बना लिये है सबने
और उन्ही मापदण्डो पे औरो को लगते कसने
अच्छे बुरे की परिभाषा कुछ ऐसी सब ने बनायी
जो बात लगी अच्छी खुद को उसमे ही दिखी अच्छाई
अपनी गलती नज़र नही आती है उनको कोई
जब भी कुछ भी गल्त हुआ गलती दूजे मे पाई
किसी का सुख थोडा भी उनसे नही है देखा जाता
खुद तो सुख देना ही नही कोई और भी क्यों दे जाता
खुद्द का ढौग पाखण्ड भी उनको धर्म नज़र है आता
दूजा करे धर्म भी तो पाखण्डी है कहलाता
सिर्फ किताबी बातें पढ कर जीते सपनो की दुनिया मे
असली दुनिया मे क्या होता उससे नही कोई नाता
भूखे रहो प्यासे मर जाओ मन मारो बाबा बन जाओ
धर्मगुरूओ की मौज़ करो अपना'सब कुछ'उन पे लुटाओ
खुद तो त्यागो पैसा लेकिन उनका घर भरते जाओ
घर वालो को मारो पीटो उनके आगे शीश झुकाओ
बाबा घूमेगा कारो मे भले सडक पे तुम आ जाओ
पाई पाई बचा बचा के बाबा के चरणों मे चढाओ
तन मन धन सब उन गुरुओ को करते है वो अर्पण
जिन गुरुओ ने कभी नही देखा है मन का दर्पण
उनका ढोगी जीवन उनको सदचार नजर आता
जिन्दादिली से जीने वाला उनको जरा ना भाता
मेरे गीत गजल कविता सब उनको नही है भाते
क्योकि ये असली जीवन जीने की राह दिखाते
इसीलिये सोचा कि लिख कर उनका दिल क्यों दुखाऊ
माफ मुझे करना यारो जो अब कभी नजर ना आऊं

जब प्यासा मरना किस्मत है तो नदी किनारे क्या मरना

हसरत मार के जीना है तो तेरा साथ भी क्या करना
खुद भी परेशां क्या होना,तुझ को भी परेशां क्या करना

दामन फटा ही रहना है तो रफुगर कोई मिला ना मिला
जब चाक गरेबां सीना नहीं तो सुई या धागा क्या करना

बून्द बून्द को तरसा दे उस जल के स्त्रोत से क्या हासिल
वो नदिया हो या दरिया हो नलकूप हो या फिर हो झरना

कभी होंठ तलक भी भीगे नहीं तो दिल की प्यास बुझेगी कब
जब प्यासा मरना किस्मत है तो नदी किनारे क्या मरना

ना तो मन्जिल ही दिखती है ना राह नज़र आती है कोई
ऐसे नाकाम सफर मे यारा तुझको शामिल क्या करना

Friday, March 5, 2010

जो प्यार किताबी रह जाए उस प्यार नहीं मै कह सकता

जो यार के काम ना आये कभी उसे यार नही मै कह सकता

जो प्यार किताबी रह जाए उस प्यार नही मै कह सकता

सह सकता हूँ दुःख गम या तकलीफ चाहे जितनी भी हो

बस खुशी मुझे कोई दे जाए तो थोड़ी भी नही सह सकता

जुबां पे कुछ और दिल में कुछ ये रीत है दुनिया वालो की

लो तुम ही सम्भालो ये दुनिया मै तो इसमें नही रह सकता

या तो खुल के जी लेने दो या फिर महफ़िल से जाने दो

महफिल की रस्में निभाने को मैं तो जीना नहीं कह सकता

मुझको तो उड़ने के लिए आकाश भी छोटा पड़ता है

पिंजरे के पंछी की तरह मैं दायरों में नही रह सकता

प्यार वफा चाहत अपनापन जो चाहो नाम दो तुम इसको

बात सिर्फ इतनी है उस बिन दो पल भी नही रह सकता

है हिम्मत तो आ हाथ थाम नही हिम्मत तो फिर घर में बैठ

बुजदिल के हाथ में हाथ किसीका ज्यादा देर नही रह सकता

मैं ज़िंदा हूँ विपरीत दिशा बहने की ताकत रखता हूँ

मुर्दा मछली सा पानी के संग साथ साथ नहीं बह सकता

Thursday, March 4, 2010

कौन है वो मेरा क्या है तुम ही कुछ बतलाओ

कौन है वो मेरा क्या है तुम ही कुछ बतलाओ
मेरा होकर भी मेरा नहीं क्या लगता है समझाओ

 दूर दूर रहते हैं लेकिन पास पास भी रहते हैं
 दिल की सारी बाते अक्सर इक दूजे से कहते हैं

 इक दूजे के काँधे पे सर रख कर हम रोये हैं
 इक दूजे का हाथ पकड़ अक्सर गलियों में खोये हैं

 दिल में समाये हैं हरदम बाहों में समाये कभी नहीं
 एक ही छत के नीचे अजनबी बन के भी हम  सोये हैं

एक ही  थाली ,एक कटोरी इक चम्मच से खाते हैं
इक दूजे के पोंछे आंसू जब भी हम रोयें हैं

घर का मालिक मै हूँ तो वो भी नहीं उसकी चेरी
तुम ही कहो कि कौन है वो और क्या लगती है मेरी

Wednesday, March 3, 2010

जला है यूं घर का मेरे तिनका तिनका

अंधेरो में रहने की आदत है हम को
उजालो में आने से डरते बहुत हैं
तेरे आने से घर हो सकता था रौशन
पर आँखे चोंधियाने से डरते बहुत हैं
जिसे भी दिखाए उसी ने कुरेदे
जख्मो की अपनी यही दास्ताँ है
बेवजह नही जो किसी मेहरबान को
जख्म अब दिखाने से डरते बहुत हैं
अभी तक भी सब की 'ना' ही सुनी थी
तेरी 'ना' भी कोई अजूबा नही है
सच तो है ये कि मेरी जानेमन
तेरी ' हाँ ' हो जाने से डरते बहुत हें
चाहा जिसे भी दिलोजान से चाहा
बस इतनी सी गल्ती रही है हमारी
है चाहत कि तुमको भी चाहे बहुत
पर गलती दोह्राने से से डरते बहुत हैं
राहों मे मिलते हो तब पूछते हो
कैसे हो क्या हाल है आपका
कभी घर में फुरसत से बैठो
सुनाने को गम के फसाने बहुत है
जब भी नशेमन बनाया है कोई
गिरी आसमान से कई बिजलियाँ
जला है यूँ  घर का मेरे तिनका तिनका
नया  घर बनाने  से डरते बहुत हैं

Tuesday, March 2, 2010

या तो अब तुझ संग जीना है या फिर तुझ संग ही है मरना

प्यार तेरा नफरत में बदल जाए वो काम नही करना
अपनी खुशी के लिए  किसीका दामन गम से क्या भरना

हमको तो आदत है यूं भी प्यासा जीते रहने  की
दो घूँट पानी के लिए किसी कूए को जूठा क्या करना

ये होठो तक की प्यास नहीं दिल भी प्यासा मन भी प्यासा
ये प्यास किसी से बुझनी नही फिर दोष पानी पे क्या धरना

जीने मरने में फर्क नहीं मतलब तो तेरे साथ से है
या तो अब तुझ संग जीना है या फिर तुझ संग अब  है मरना

Monday, March 1, 2010

ख़्वाब टूट जाने का गम यारा बहुत बुरा होता है

संभल संभल के अनजानी राहों में चलना होता है
लौट के वापिस आ पाना वरना मुश्किल सा  होता है

पूरा कर सकते ही नहीं वो ख़्वाब किसीको मत दिखला
ख़्वाब टूट जाने का गम यारा बहुत बुरा होता है

साथ निभाने की दिल में ना चाहत है ना ही हिम्मत
बात बात में हाथ पकड़ने से फिर यारा क्या होता है

वक्त मिला तो समझाऊँगा कौन फकीर कौन अमीर
नही चाहिए कुछ भी जिस को, असली  शहंशाह होता है

Sunday, February 28, 2010

अंग अंग जब तक ना भीगे तब तक होगी होल़ी

कभी खेला करते थे होली जिद्द कर के हम सबसे

पर जब से हुआ बदरंग ये जीवन छुए नही रंग तबसे

यूं तो होली खेलने अब भी साथी घर आते हैं

पर जीवन हो बदरंग तो फिर रंग कहाँ कोई भाते हैं

तुमने जानू कह कर मेरी जान ये क्या कर डाला

रंगहीन जीवन में मेरे फिर से रंग भर डाला

फिरसे जगा दी सोई उमंगे तुमने बन हमजोली

मन में हुड्द्म्ग मचा रही है इच्छाओं की टोली

तुमने हम पर रंग डाल कर तो दी है शुरुआत

देखना अब किन किन रंगो की होगी तुम पर बरसात

अंग अंग जब तक ना भीगे तब तक होगी होली

अब ना बचेगी तेरी चुनरिया अब ना बचेगी होली

डरते डरते चुटकी भर रंग इक दूजे को लगाना

मैं ना मानु इसको होली मै ठहरा दीवाना

बस माथे गुलाल का टीका ये भी हुई कोई होली

ना रंगो से रंगी चुनरिया ना ही भीगी चोली

अरे होल़ी में भी सीमाओं का क्या रखना अहसास

भूखा ही मरना ही तो फिर तोड़ना क्यों उपवास

खेलनी ही तो जम कर खेलो मस्ती भरी ये होल़ी

मातम की तरह ना मनाओ होल़ी मेरे हमजोली

होल़ी को होल़ी सा खेलो या रहने दो हमजोली

जितनी भी होनी थी होल़ी तुम संग होल़ी होल़ी

Saturday, February 27, 2010

गंगा खुद नाले में गिर जाए तो नाला क्या करे

मंजिले सब से जुदा हैं रास्ते भी हैं जुदा
हमसफर कोई ना बने तो ये  मुसाफिर क्या करे
 
 नाले का गंगा में मिलने का तो कोई हक़ नही
 गंगा खुद नाले में मिल जाए तो नाला क्या करे
 
आग लगने से बचा रखा था सूखी घास को
चिंगारी कोई डाले तो घास ना जले तो क्या करे
 
 साजे दिल के तार ढीले खुद ही तो उसने कसे
 छूने से फिर सगीत बज उठा तो साज क्या करे
 
 आग पे तो खुद कडाही अपने हाथों से चढा दी
अब कडाही ना तपे तो फिर कडाही क्या करे
 
अपने हाथों में उठाकर खुद शिखर तक ले गये
 फिर छोड़ने से नीचे कोई ना गिरे तो क्या करे
  किसी को आजमाने का ये तो तरीका ना हुआ
खुद ही परोसी थाली और मुहं में निवाला खुद दिया
भूखा ऐसे में ना रोटी  खाए तो फिर क्या करे

 वो' हाँ 'करे तो भी मरे वो 'ना' करे तो भी मरे

Monday, February 22, 2010

तुम पहले दोस्त बनी होती तो बात ही कुछ और होती

तुम पहले दोस्त बनी होती तो बात ही कुछ और होती

कुछ पहले और मिली होती तो बात ही कुछ और होती

ये सूरज पहले निकल आता मेरे दिन कुछ और हुए होते

ये चांदनी पहले खिली होती तो रात ही कुछ और होती

ता उम्र अकेले तन्हा ही मै यहाँ वहां भटका ही किया

तेरा साथ मिला होता पहले तो बात ही कुछ और होती

जीवन के इस मरुथल में सूरज तो दहकते मिले बहुत

ये बदली पहले घिरी होती तो बरसात ही कुछ और होती

अब मुंह में दांत नही बाक़ी तो चनो का बोलो क्या कीजे

ये पोटली पहले मिली होती तो बात ही कुछ और होती

धरती तो क्या ये आसमान भी हम को छोटा पड़ जाता

कुछ पहले उड़ान भरी होती तो बात ही कुछ और होती

चंद खुशियाँ तेरी झोली में भर दूँ कोशिश है अब भी मेरी

कहीं पहले मिली होत्ती तो ये सौगात ही कुछ और होती

किस किस बात की बात करूं बस इतनी बात समझ लीजे

कुछ पहले बात हुई होती तो हर बात ही कुछ और होती

Sunday, February 21, 2010

अब तक तो दर्पण टूटा था कोई अक्स भी आज तो तोड़ गया

अब तक तो दर्पण टूटा था कोई अक्स भी आज तो तोड़ गया

पहले छूटे रिश्ते नाते लेकिन इक साया साथ में था

जाने कहाँ हम से चूक हुई साया भी साथ को छोड़ गया

पहले भी जख्म मिले हैं बहुत पर वक्त ने उनको भर डाला

नासूर से भी ज्यादा गहरा कोई जख्म वो दिल पे छोड़ गया

वो पल पल हमे आजमाता रहा हम प्यार समझते चले गये

आजमाईश ही अजमाइश में वो दिल का शीशा तोड़ गया

लगता था खुशियाँ ही खुशियाँ दामन में भर देगा

वो जान से प्यारा यार मेरा मेरी आँख में आंसू छोड़ गया

बेखबर से थामे हाथ उसका हम चलते गये चलते ही गये

अब जाऊं कहाँ कुछ सूझे ना ऐसे मोड़ पे वो हमे छोड़ गया

Saturday, February 20, 2010

वो मेरे करीब इतना आई मै समझा सब कुछ सुलझ गया

जो होना था जो होता है आखिरकार तो वो ही हुआ
वो अपनी राह में चली गयी मै अपनी राह पे चता गया

कभी  उसने कहा था जो होगा दोनों ही मिलकर सुल्तेंगे
बिंदास जियो और खुल के जीयो हैं साथ तो सबसे निपटेंगे

वो मेरे करीब इतना आई मै समझा सब कुछ सुलझ गया
अहसास हुआ बेचारगी का जब देखा सब कुछ उलझ गया 

मैं और  तेरे साथ मुझे पागल समझा क्या  उसने कहा
ये तो सिर्फ मजाक था उसको मैंने क्यों सच मान लिया 

अपनी नजरो में  उसने इस हद तक मुझको  गिरा दिया
ना खुदा मिला ना यार मिला ना इधर का रहा ना उधर का रहा

Friday, February 19, 2010

मेरे यार सा सच्चा यार बड़ी किस्मत वालो को मिलता है

तुम बिन रहना मुश्किल ही नही नामुमकिन सा लगता है
 हर पल या तुम संग बीतता है या तेरी याद में कटता है

 किस हद तक दिल में समाये हो  इसका तुमको एहसास नही
 दिल जितनी बार धडकता है तेरे नाम की माला जपता है

सांस तेरी साँसों में मिल कर आती है तो लगता उम्र बढी
वरना  सांस के आने पर भी यूँ लगे जैसे  दम घुटता है

 जिसे मर के स्वर्ग में जाना हो भगवान् की पूजा करता रहे
 जिसे जीते जी चाहिए जन्नत  वो तेरी पूजा करता है

मैं प्यार में यार के कदमों पे सब अर्पण करता जाता हूँ
और  लोग समझते है पागल है जान बूझ कर लुटता है

 कैसे  किसी को समझाऊं समर्पण ना करूं तो फिर क्या करूं
 यार मेरा जब  सच्चे दिल से मुझ पर जान छिड़कता है

क्यों ना अपनी किस्मत पे बतलाओ  मै नाज करूं 
मेरे यार सा यार बड़ी किस्मत वालों को मिलता है

Sunday, February 14, 2010

ऐ मेरे खुदा इतना भी ना दे जितनी मेरी औकात नही

सब से सुन्दर फूल है जो इस दुनिया के गुलशन का

अर्थी पे वो आके चढ़े ये तो कोई अच्छी बात नही

वो कोहीनूर का हीरा है किसी ताज पे ही शोभा देगा

फकीर की झोली पड़ा रहे ये तो कोई अच्छी बात नही

रानी महारानी बनने का अधिकार जिसे कुदरत ने दिया

महलों की जगह खंडहर में रहे ये तो कोई अच्छी बात नही

वो परी है तो फिर अपने लिए क्यों नही फरिश्ता ढूँढती है

नाचीज से जोड़ रही रिश्ता ये तो कोई अच्छी बात नही

वो भोर की पहली किरण है तो मैं सांझ का हूँ ढलता सूरज

कुछ पल भी साथ नही मुमकिन ता उम्र दे सकता साथ नही

कोई मेरे यार को समझाओ मेरी वो समझता बात नही

जिस रात की सुबह होती है मै वो किस्मत की रात नही

ऐ मेरे खुदा इतना भी ना दे जितनी मेरी औकात नही

लंगूर के हाथ में हूर लगे ये तो कोई अच्छी बात नही

Friday, February 12, 2010

हुस्न की वो मल्लिका है और वो भी पूरे शवाव पे है

माना ये कि पास में उसके दौलत-ऐ हुस्न अपार है
 पर काम किसी के ना आये तो सब दौलत बेकार है

हुस्न की वो मल्लिका है और वो भी पूरे शबाब पे
 हम है किस गिनती में उसके चाहने वाले हजार है

 छूने से उसको डरते है मर ही ना हम जाए कहीं
जब  देखने भर से ही चढ़ता   इश्क का बुखार है

 कोई नजरो से  घायल है  तो कोई मर मिटा मुस्कान पे
 सुना है कब्रिस्तान तक  अब जनाजो की  कतार है

 बरसों नही तो गरजो ही सावन का कुछ अहसास  हो
खाली बदली का छा जाना  सावन में बेकार है

 ज्येष्ठ और आषाढ़ के सूखे को  वर्षों झेला है
क्या गलत है सावन जो तुझसे बारिश की दरकार है

तन से उसका मन है सुंदर मन से सुंदर उसका तन
कौन क्या उस लेता है उससे  अपना अपना विचार है

 वो  चाँद से सुंदर है  लेकिन उससे  हासिल क्या हुआ
मेरे घर तो  पहले सा अन्धेरा बरकरार है

 किसी के अंगना चाँद उतरे मुझको इससे गिला नही
  मेरे घर भी  दिया जले बस इसका  इन्तजार है

Wednesday, February 10, 2010

किसी ने हमसे प्यार किया हो ऐसा पहली बार हुआ है

देर से ही पर खुदा मेहरबां हम पे बहुत  इस बार हुआ है
 दुनिया में जो सब से हसी है उसको हमसे प्यार हुआ है

 तानो या उल्हानो से तो झोली अपनी भरी रही
 किसी ने उस में प्यार भरा हो ऐसा पहली बार हुआ है

जख्म दिए हो किसी ने हमको ऐसा सारी उम्र हुआ है
 पर मरहम ले कोई घर आया ऐसा पहली बार हुआ है

सपनों को बनते और टूटते कौनसी  रात नही देखा
अब जाकर अपना सपना मुश्किल से साकार हुआ है

पास में रहकर भी मेरे दिल से सब  अक्सर दूर रहे
 दूर में रह कर दिल के पास हो ऐसा पहली वार हुआ है

 किसी ने हम को वुक्के दिए हों ऐसा अक्सर ही होता था
 पर हमने किसी को फूल दिया ऐसा पहली बार हुआ है

हमने किसी से प्यार किया शायद पहले भी ये हुआ
पर  हमसे किसीने प्यार किया हो ऐसा पहली बार हुआ है

तो फर्क बचा क्या गली के आशिक और तेरे दीवाने में

वापिस लौट जा ऐ राही या राह बदल ले फिर कोई
 शायद कुछ भी हासिल ना हो तुझ को मेरे वीराने में

 तेरा मिलना तय था बेशक जीवन के इस सफर में लेकिन
तेरा बिछुड़ना सोचा तक नही हमने जाने अनजाने में

कुछ भी मुमकिन नजर तुझे नही आता अपनी कहानी में
 पर कुछ भी नामुमकिन सा नही ऐ दोस्त मेरे अफसाने में

रंग रूप  धन दौलत यौवन फर्क ये सब मिट सकते हैं
 पर फर्क उम्र का मिट नहीं पाना तेरे मेरे मिटाने से

फूल से ज्यादा हमको फूल की महक सुहानी लगती है
फूल कहाँ अच्छा लगता है खिलता हुआ वीराने में

तेरे गोरे बदन से ज्यादा  मन में तेरे  ना झाँका  तो
फर्क बचा क्या गली के आशिक और तेरे दीवाने में

मंजिल बदल नही सकते तो आ राहों को बदले हम
हमसफर रहो तुम राहो में तो मजा है चलते जाने में

मंजिल पे हो या राह  में  हो  मतलब तो तेरे साथ से है
तुम साथ रहो तो फर्क नहीं मंजिल खोने या पाने में

बात वही होती  है तो फिर फर्क क्यों इतना होता है
खुद वही बात समझने में और औरो को समझाने में

Tuesday, February 9, 2010

लगी हाथ अपने है प्यार की इक किताब अभी अभी


अब देखिये क्या रंग दिखाता है रेड रोज़
उन्हें आज हमने दिया है इक गुलाब अभी अभी

उस फूल में भी दिल मेरा आये उसे नजर
दिल के लहू से है रंगा गुलाब अभी अभी

 ता उम्र बदली करवटे ना नींद थी ना ख़्वाब था
 लगी आँख तो दिखा है उसका ख़्वाब अभी अभी

ता उम्र मिले जख्म तो अब जा के तुम मिली
खुदा ने किया चुकता मेरा हिसाब अभी अभी

बनके सवाल वो सारी उम्र  उलझाता रहा मुझे
मिलने से तेरे मिल गया वो जवाब अभी अभी

 समझेगे अब  है प्यार क्या होती है क्या वफा
लगी हाथ अपने है प्यार की किताब अभी अभी

Monday, February 1, 2010

मंजिल कही होती है तो राहे ले जाती है कहीं

आगाज से अंजाम का अंदाजा लगता ही  नही
मंजिल कहीं होती है और राहें ले जाती हैं कहीं

ख्वाहिशो के अंकुरित होने पे खुश क्या होईये
पौधा कभी बनती नही फल कभी लगते नही

वो आदतन ही मुस्कराता है तो क्या पता चले
कौन सी मुस्कान उसकी प्यार है कौन सी नहीं

अब ऐसे मेहरबां से फरमाइश करें तो क्या करें
जो जब भी कुछ मांगो तो कहता है नहीं अभी नही

उम्र सारी गुजार दी और कुछ ना हासिल कर सके
सोचते भर रह गए क्या गलत है और क्या सही

Saturday, January 30, 2010

नही आज तो कल दिल का शीशा टूट जाना है जरूर

देखिये अब जिन्दगी रंग दिखलाती है क्या
वक्त ने खोला है फिरसे हम पे दरवाजा नया

 दोस्त या दुश्मन कहूं इस वक्त को तू ही बता
 यूँ तो मिलाता है मगर मिलते ही करता है जुदा

 जगती है उम्मीद कुछ पाने कि जब भी जिन्दगी से
 वक्त लाकर आइना हरबार   देता है दिखा

क्या मुकद्दर है मेरा और क्या मेरी तकदीर है
सामने थाली रही और अंदर निवाला ना गया

 हर शख्स ही मुझ से बड़ा दिखने लगा है आजकल
 वक्त ने कद मेरा किस हद तक बौना बना दिया

 नहीं आज तो कल दिल का शीशा टूट जाना है जरूर
यही  सोच कर तेरा अक्स हमने आत्मा में बसा लिया

तेरे लिए दीवानगी किस हद तक पहुंची है ये देख
 दिल टूटा लेकिन अक्स तेरा हमने पूरा बचा लिया

Friday, January 29, 2010

मेरे क़त्ल की साजिश, वही, रचते रहे है रात भर

किसके लिए और किसलिए रोये हम रात रात भर
 तुम रही खामोश या तेरी कही किसी बात पर
 
 बन के बदली तुम बरस जाती तो करते शुक्रिया
 वैसे गुजारिश के सिवा मेरा बस कहाँ किसी बात पर
 
 ज़िन्दगी भर ही हसीनो ने हमें धोखा दिया
 तुम्ही कहो कैसे भरोसा कर लूँ औरत जात पर
 
 कोशिश भी की काबिल भी थे लेकिन ना हासिल कुछ हुआ
 कामयाबी की लकीरे ही ना थी मेरे हाथ पर
 
 इससे से ज्यादा क्या हमारी बेबसी होगी सनम
 हमदर्द मिला है वो जो जख्म देता है बात बात पर
 
देख कर ज़िंदा मुझे हैरान क्यों होते हैं सब
हैरान हैं  शायद ये शख्स ज़िंदा है किस बात पर

मेरी लम्बी उम्र की जो दिन में  करते है दुआ
 क़त्ल की मेरे वो साजिश रचते रहे है रात भर
इक सवाल रोटी का हम से कभी ना हल  हुआ
फख्र था बड़ा हमें हिसाब की किताब पर

Thursday, January 28, 2010

इसे मान लेना तुम बेशक अंतिम इच्छा मेरी

इसे मान लेना तुम बेशक अंतिम इच्छा मेरी
मरू तो हाथो में रख देना तस्वीर कोई इक तेरी

इसके बाद इक रोज़ खुदा से अपनी मुलाक़ात होगी
शिकवे शिकायत होंगे आमने सामने हर बात होगी

 आखिर में पूछे गा खुदा अब बता क्या मर्ज़ी है तेरी
 कहूंगा मैं कि मेरे खुदा बस इतनी अर्ज़ है मेरी

अगले जन्म का सफर अकेले मुझ से तय ना होगा
 तय होगा जब हसीं हमसफ़र साथ मेरे कोई होगा

फिर पूछेगा मुझसे खुदा हमसफर हो तेरी कैसी
दिखला के तस्वीर तेरी कह दूंगा बिलकुल ऐसी 

 ना दो इंच इससे लम्बी ना दो इंच इससे छोटी
 ना थोड़ी सी पतली इससे ना थोड़ी इससे मोटी

ना थोड़ी भी हलकी इससे ना थोड़ी इससे भारी
 ना गोरी हो इससे ज्यादा ना हो इससे कारी

 नयन नक्श हूबहू हो ऐसे जैसी ये है दिखती
जुल्फे भी बिलकुल वैसी हो जैसी ये है

चले तो बिलकुल ऐसी  जैसी ये लहरा के चलती
 बोले तो इस जैसा कानो में ज्यों मिश्री घुलती

 कहूंगा मैं  ए खुदा मेरे  बस इतना और कर देना
 इसके दिल में मेरे लिए थोड़ा सा प्यार भर देना

Saturday, January 23, 2010

क्यों अपने रंग रूप का इतना तुझे गरूर है

क्यों अपने रंग रूप का इतना तुझे गरूर है
 है अब जवानी की दोपहरी तो सांझ कितनी दूर है

 इक बार सांझ हो गयी तो रात भी घिर आयेगी
फिर लाख तूं करना यत्न वो बात न रह पायेगी

 आँखों से कुछ दिखना नही तो नैन लड़ने किससे हैं
 मुंह में दांत ही ना होंगे हंस के किस को दिखायेगी

 बाल सब सफेद होगें और झड़ने भी लगेगे
 फिर ये जाल जुल्फों का किस पे तूं फैलाएगी

 ना उमंग तेरे मन में कोई  ना कशिश तेरे तन में होगी
 किससे फिर होगा मिलन फिर किससे मिलने जायेगी

इसलिए कहता हूँ मेरी मान कल पे टाल मत
ढूँढ़ हर जवाब मुझ में खुद से कर सवाल मत

 जो मिला है  वक्त अब, हर रोज मिल पाता नहीं
 कल का क्या है ये कभी आता कभी आता नहीं

कुदरत की हर  सौगात का कर पूरा इस्तेमाल तूं
यूं भी ढल जाएगा हुस्न कितना भी संभाल तूं

चाहने वालों की चाहत जो कोई ठुकराता है
 खुद भी चाहत के लिए इक उम्र तरस जाता है

Friday, January 22, 2010

हम किनारे पर भी होते तो भी डूबते सनम

इससे तो अच्छा था नश्तर ही चुभा जाता कोई

मरहम लगाये बिन अगर जाना था वापिस यार को

बीमार जानता है जब कि मर्ज़ लाइलाज है

बेकार है झूठी तसल्ली देना फिर बीमार को

गर जीता जाए दिल किसीका हार कर अपना अहम

जीत से बेहतर समझ लो ऎसी हसीं हार को

माझी ही चाहता ना था कि पार पहुंचाए हमें

छोड़ गया था कीनारे पर ही वो पतवार को

हम किनारे पर भी होते तो भी डूबते सनम

बेवजह मुजरिम ना ठहरा माझी या मझधार को

जख्मो को सहलाता ना तो भी कोई ग़म ना था

और तो जख्मी ना करता जालिम मेरे प्यार को

साथ छोड़ने की बात करता था यार बार बार

हमने कहा आमीन और दिया छोड़ इस संसार को

Thursday, January 21, 2010

प्यार नही करना है तो फिर जताती क्यों हो

प्यार नही करना है तो फिर प्यार जताती क्यों हो
दूर दूर रहना है तो फिर पास में आती क्यों हो

दिल से दिल ही नही मिले तो जिस्म मिलेगे कैसे
 नही मिलाना दिल से दिल तो हाथ मिलाती क्यों हो

प्यास बुझाने की तुझ में ना चाहत है ना हिम्मत
 प्यास बुझा सकती ही नही तो प्यास जगाती क्यों हो

 कोई आस नही होती पूरी तो बहुत निराशा होती
 आस नही करनी पूरी तो आस बंधाती क्यों हो

 दे सकती हो कोई दवा तो आकर पूछो हाल मेरा
दवा नही देनी तो दर्द भी याद दिलाती क्यों हो

 तेरी ही जिद्द थी अपने सब जख्म दिखाऊँ तुझको
 देख के अब जख्मों के मेरे नाहक घबराती क्यों हो

Tuesday, January 19, 2010

जी करता है कभी मै तेरे होंठ गुलाबी चूमू

तुम चाहो तो समझ लो ये कि गया मै तुझ से हार
तुम चाहो तो मान लो ये कि मुझे है तुम से प्यार

जी करता है कभी मैं तेरे होंठ गुलाबी चूमूं
कभी तुझे आगोश में लेकर बिना पीये ही झूमु

या होठों से कोई गजल लिखूं तेरे गालो पे
 या कोई गीत बनाऊं तेरे मखमली से बालों पे

 या गदराये जिस्म के तेरे अंग अंग पे लिखूं कविता
 या फिर तेरी चाल सी कोई ढूँढ़ लाऊं नई सरिता

 कभी तेरे गालों को चूमूं जुल्फों से तेरी खेलूं
और कभी मन करता कसके बाहों में तुझे लेलूं

 तुम चाहो तो कह लो इसको दबी वासना मेरी
 वैसे सीधे सच्चे शब्दों में प्रेम का है इजहार
 और अगर चाहो तो मान लो मुझे है तुम से प्यार

 पहरों बैठे रहें हम लेके इक दूजे का हाथ
 इक दिल दूजे दिल से कर ले बिन बोले हर बात

 शिकवा शिकायत और गिला बिना कहे मिट जा
ए तुम इक कदम बढाओ और दो कदम मेरे बढ़ जायें

 कभी तेरे हाथो की लकीरें मिलें मेरे हाथों में
 बिगड़ी किस्मत संवर जाए बातों ही बातों में

जी करता है जब भी तुम घर आओगी इस बार
 जिद्द कर तेरा हाथ पकड़ लू और करूं इसरार

बहुत दिनों के बाद अब लगता आता है इतवार
तुम चाहो तो समझ लो ये की मुझे है तुम से प्यार

Monday, January 18, 2010

तुम चाहो तो कह सकती हो मुझे है तुम से प्यार

तुम चाहो तो ये समझो कि गया मै तुम से हार
तुम चाहो तो मान लो ये कि मुझे है तुम से प्यार
और अगर चाहो तो समझो तुम बिन रह नही सकता
 जो चाहो वो समझो लेकिन मै कुछ कह नहीं सकता

 हाँ इतना कहूगा और नही अब कर सकता इन्तजार
 तुम चाहो तो मान लो ये कि मुझे है तुम से प्यार

ना जीवन में रस है कोई ना ही कोई मज़ा है
ऐसे लगता है कि तुम बिन जीना एक सजा है

 सच तो ये है घर तुझ बिन खाली खाली लगता है
जैसे कोई गुलशन उजड़ा पतझड़ में दिखता है

इक तेरे आने से ही आ जायेगी फिर से बहार
तुम चाहो तो मान लो बेशक मुझे है तुम से प्यार

 रात कोई कटती है कैसे बदल बदल के करवट
 खुद ही बयां करेगी तुमसे बिस्तर की हर सिलवट

 याद तुम्हे करते करते कभी आँख अगर लग जाती
 सपनों में तुम आ जाती हो रात थोड़ी कट जाती

इसीलिए बस रात का मुझ को रहता है इन्तजार
तुम चाहो तो कह सकती हो मुझे है तुम से प्यार

Sunday, January 17, 2010

आसमां छोटा पड़ेगा इक दिन उसकी परवाज को

शायद ये जीत का  हुनर उसको  खुदा की देंन है
हर एक बाजी जीतता है पहले बाजी हार के

ये नही शतरंज ये तो इश्क की बिसात है
जीती जाती है यहां हर एक बाजी हार के

जान खुद दे दूंगा हंस के  कह दो  मेरे यार से
काम नाहक ले रहा क्यों  तीर से तलवार से

आसमां छोटा पड़ेगा इक दिन उसकी परवाज को
 बाहर निकलेगा परिंदा जो पिंजरे की दरो दीवार से

छाछ के भी हैं जले नहीं दूध के ही हम जले
हर शै को पीना पड़ता है अब फूंक मार मार के

Saturday, January 16, 2010

मन के दरवाजे पे दस्तक देना ही काफी नहीं

प्यार क्या होता है कोई सीखे मेरे यार से
ना गरज दौलत से उसको ना मेरे घरबार से

 ना उसे मौसम की परवाह ना उसे दुनिया का डर
 वारी मै हिम्मत पे उसकी सदक़े उसके प्यार पे

 मन के दरवाजे पे दस्तक देना ही काफी नहीं
घर के दरवाजे पे दस्तक शामिल है उसके प्यार में

राम जाने प्यार उसका पहुंचे किस अंजाम पर
आगाज से ही तेज़ है जो रोकेट की रफ्तार से

 दिल से दिल के तार लगता है कुछ ऐसे जुड़ गये
 बाते हजार हो गयी बिन खोले मुंह मेरे यार के

 ना तडपता है न तड़पाता है वो इन्तजार में
जानता है वो मज़ा असली है वस्ल यार में

उसके आने से महक उठता चहक उठता है घर
 जुल्फों में उसकी कैद है मौसम सारे बहार के

 प्यार क्या होता है कोई सीखे मेरे यार से
ढाई मिन्टो में पढ़ा दे सारे अक्षर प्यार के

शायद बुझती लौ की कोई आखरी चमक है
ये प्यार हम को हो चला है इक जवां दिलदार से

Thursday, January 14, 2010

बेवजह तो दिल धडकता है कहां यूं जोर से

जब से वो हमसे और उनसे हम मिलने लगे
जिन्दगी के सारे मायने ही बदलने लगे

ता उम्र तो अकेले ही तय किया सारा सफर
है खत्म होने को सफर तो हमसफर मिलने लगे

बेवजह तो दिल धडकता है कहां यूं जोर से
दिल की गली से लगता है वो होके गुजरने लगे

यकीनन ही दिन बहारों के कुछ दूर अब नही रहे
उनके घर आने से सारे मौसम बदलने लगे

बेशक कोई नायाब तोहफा खुदा ने अब बख्शा हमें
गैर गुमसुम हो गये जो अपने थे जलने लगे

इतना हसीन हमसफर मिला भी तो किस मोड पर
जब खत्म सफर हो चला दुनिया से हम चलने लगे

Wednesday, January 13, 2010

चन्द सिक्को की खातिर अपना यार बदल गया पाला

चन्द सिक्को की खातिर अपना यार बदल गया पाला
जपने लगा है अब तो वो किसी और के नाम के माला

 माली और सैयाद मे जिस को फर्क नजर नही आता
 दाना चुगते चुगते परिन्दा जाल में वो फस जाता

कान्टे के सग लगा केचुआ मछली गर खायेगी हो
कितनी होशियार वो मछली आखिर फस जायेगी

ये दुनिया है यहां शिकारी अक्सर रूप छुपाता
लक्ष्मण रेखा पार हुई तो सिया हरण हो जाता

अपने रिश्ते तय करने का सब को है अधिकार
पर वो रिश्ता क्या रखना जो जानदार ना शानदार

Tuesday, January 12, 2010

इससे अच्छा था कि नश्तर ही चुभा जाता कोई

ज़ब से वो हम से और उनसे हम मिलने लगे
जिन्दगी के सारे मायने ही बदलने लगे

डर ये है कि फिर नया कोई जख्म ना मिले हमे
 उम्मीद ये कि शायद किस्मत अबसे बदलने लगे

 डर डर के राहे इश्क मे रखना था हर कदम मगर
 इक बार देखा फिर तो कदम खुद ब खुद चलने लगे

 ना कोई चाहत ना थी उम्मीद ही दिल मे कोई
 वो पहलु मे बैठे तो अरमां फिर से मचलने लगे

 अब ये भी घर मे यार का आने में आना है बता
 आये सुबह दो बातें की हुई सांझ तो चलने लगे

 इससे अच्छा था कि नश्तर ही चुभा जाता कोई
 मरहम लगाये बिन क्यों यार वापिस घर चलने लगे

Monday, December 28, 2009

मेरी नजरो से  खुद को देखो खुद को जानो तुम
 तुम सा सुंदर कोई नहीं ये बात मेरी सच मानो तुम

होंठ गुलाबी नयन शराबी रेशमी जुल्फें काले बाल
 बिना पीये ही झूम उठे देखे जो तेरी लहराती चाल

 सुडोल  बदन नयन नख्श तीखे चहरे पे गज़ब का नूर
 ऐसा लगता है धरती पे उतर आयी जन्नत की हूर

 चाल चले तो ऎसी जैसे मंद मंद चलती है हवा
मुस्काती है ऐसे जैसे फूल कमल का खिलता हुआ

 बदन तेरा गदराया जो भी छू ले वो ही  तर जाए
इसके बाद क्या उसको फिक्र वो ज़िंदा रहे या मर जाए

एक नजर जो देख ले तुझ को होके रह जाए तेरा
 मै  भी हुआ दीवाना खुद तो  क्या कसूर है तेरा

 घर का तेरे पता है लेकिन  मन का मुझे  पता दे
 कौनसा रस्ता सीधे तेरे मन तक जाए बता दे

काश तू कोई  दुःख सुख अपना कभी तो मुझ से बांटे
और  हटा पौऊ मै तेरी राह से दुःख के कांटे




Wednesday, December 9, 2009

इस जीवन में पड़ते पड़ते कई पासे उलटे पड़ जाते हैं

रिहते टूटें साथी छूटे लेकिन तूं आंखें नम ना कर

पतझड़ के मौसम में अक्सर पेड़ से पत्ते झड़ जाते है

अपनी धुन में मस्त रहे हो नहीं सुनी कोई बात किसी की

अपनी तरह से जीने वाले यूं ही अकेले पड़ जाते हैं

ये देख के तुफाँ के आगे कभी टिक पाना आसान नहीं

घास तो अक्सर झुक जाता है पेड़ हमेशा अड़ जाते हैं

जिद्द छोडो तो बेहतर है , है वक्त संभलने का अब भी

तेज तुफाँ में अड़ने वाले अक्सर जड़ से उखड़ जाते की

माना तुम खिलाड़ी हो पक्के पर ये चौसर का खेल नहीं

इस जीवन में पड़ते पड़ते कई पासे उलटे पड़ जाते हैं

Tuesday, December 8, 2009

चाह कर भी दूरीयां दोनों नही मिटा सके

चाह कर भी दूरीयां दोनों नही मिटा सके
हम भी ठहरे रह गए तुम भी ना चल के आ सके

 उलझन सुलझने की जगह और उलझती गयी
 कुछ तुम से ना सुलझ सकी कुछ हम नही सुलझा सके

 सब कुछ समझ के भी ना इक दूजे को कुछ समझ सके
 कुछ तुम नहीं समझ सके कुछ हम नही समझा सके

 बात बिगड़ी थी तो बन भी सकती थी चाहते अगर
 तुम ने भी चाहा नही  हम भी नहीं बना सके

 लौट कर पक्षी घरौंदे की तरफ सब चल दिए
 कुछ ऎसी राह भटके लौट कर ना वापिस आ सके

तेरे मिटाने से नहीं मिटना मेरा नामो निशां
इस हस्ती को तो नाम वाले भी नहीं मिटा सके

Sunday, December 6, 2009

सौतन के इन्तजार की तारीफ कर सके तो कर i

किस कद्र तकलीफ दी है जिन्दगी तूने मुझे

अब तो तेरे नाम से होने लगी नफरत मुझे

पहले तेरे बिन कभी कोई मुझे भाता न था

अब तुझ से दूर जाने की होने लगी चाहत मुझे

आज तेरी नजरो में मेरी कोई कीमत नहीं

कल बहुत महसूस होगी मेरी जरूरत तुझे

पर मुझे अफसोस है तब मैं ना लौट पाऊंगा

सौत की बाहों में जो इक बार चला जाऊंगा

तुमने तो ठुकरा दिया तनहा किया भुला दिया

पर देख लेना वो मुझे हरगिज नहीं ठुकराएगी

तुमने साथ ना दिया तो ना सही मर्जी तेरी

सौत तेरी बावफा है साथ लेकर जायेगी

सौतन के इन्तजार की तारीफ कर सके तो कर

जिस भी पल तूम छोड़ देगी वो मुझे अपनायेगी

छीनने की उसने कोशिश इसलिए ही की नहीं

जानती थी एक दिन तूं खुद उसे दे जायेगी

सौत तेरी हो तो हो पर मेरी महबूबा है वो

मैं भी खुशी से चलूँगा जब वो लेने आयेगी

दर्द तन्हाई का शायद तब तुझे महसूस हो

मैं चला जौउगा जब और तनहा तूं रह जायेगी

तूं सात फेरे में भी अपना बन सकी ना बना सकी

वो एक फेरे में ही मेरी जान तक ले जायेगी

मौत मेरी सौत तेरी बन के जब आ जायेगी

देख लेना उस घड़ी तूं बहुत पछताएगी

किस कद्र तकलीफ दी है जिन्दगी तूने मुझे

अब तो तेरे नाम से होने लगी नफरत मुझे

पहले तेरे बिन कभी कोई मुझे भाता न था

अब तुझ से दूर जाने की होने लगी चाहत मुझे

आज तेरी नजरो में मेरी कोई कीमत नहीं

कल बहुत महसूस होगी मेरी जरूरत तुझे

पर मुझे अफसोस है तब मई ना लौट पाऊंगा

सौत की बाहों में जो इक बार चला जाऊंगा

तुमने तो ठुकरा दिया तनहा किया भुला दिया

पर देख लेना वो मुझे हरगिज नहीं ठुकराएगी

तुमने साथ ना दिया तो ना सही मर्जी तेरी

सौत तेरी बावफा है साथ लेकर जायेगी

सौतन के इन्तजार की तारीफ कर सके तो कर

जिस भी पल tuu छोड़ देगी वो मुझे apanaayegii

छीनने की उसने कोशिश इसलिए ही की नहीं

जानती थी एक दिन तूं खुद उसे दे जायेगी

सौत तेरी हो तो हो pr मेरी महबूबा है वो

मैं खुशी से चल प्दुम्गा जब वो लेने आयेगी

दर्द तन्हाई का शायद का तब तुझे महसूस हो

मई चला जौउगा जब और तनहा टू रह जायेगी

टू सात फेरे में भी अपना बन सकी ना बना सकी

वो एक फेरे में ही मेरी jaan tak le जायेगी

maut मेरी सौत तेरी बन के जब aa जायेगी

देख लेना उस घड़ी तूं बहुत पछताएगी

Saturday, December 5, 2009

सब के हाथों में पत्थर हैं और निशाने पे मेरा दिल

अपने उसूलो पे जी पाना इतना भी आसान नहीं
सब से अलग पहचान बनाना इतना भी आसान नहीं

बनी बनाई राह पे चलना कौन काम है मुश्किल का
अपनी राहें खुद ही बनाना इतना भी आसान नहीं

जिसके मन सी नहीं कर सका वो ही हम से दूर हो गया
 सब के होते तन्हा जी पाना इतना भी आसान नहीं

 इसके ताने उसके उल्हाने कैसे सहे सब तूं क्या जाने
 सीने में हर गम दफनाना इतना भी आसान नहीं

आप ही हंसना आप ही रोना आप ओढ़ना आप बिछौना
 आप ही जागना आप ही सोना आप ही पाना आप ही खोना

 हर आंसू को अकेले पीना तुम क्या जानो कितना मुश्किल
 खुद को खुद ही तसल्ली देना कैसे कर पाता है ये दिल

 पड़ी जरूरत मदद की जब भी खुद को दे आवाज बुलाया
 खुद के लिए खुदा बन जाना इतना भी आसान नहीं

आंख छलक आई मेरी तो इतने क्यों हैरान हो तुम
 मैं भी तुमसा ही इंसा हूँ बेदिल या पाषाण नहीं

सब के हाथों में पत्थर हैं और निशाने पे मेरा दिल
ऐसे में इस दिल को बचाना इतना भी आसान नहीं

Friday, December 4, 2009

सोते सोते लुट गया सब कुछ आंख खुली तो पता चला i

तेरे मेरे करने से जग में सोचो आखिर क्या होता है
जब जब जो होना होता है तब तब वैसा ही होता है

सोते सोते लुट गया सब कुछ आंख खुली तो पता चला
पता है सब लुट सकता है तो आखिर कोई क्यों सोता है

अंक गणित या अर्थशास्त्र में माना माहिर आप हुए
जीवन इतना सरल नही इतने भर से क्या होता है

अपनी तबाही का आलम क्या सब को बताते फिरते हो
असर तबाही का ऐसे में और भी ज्यादा स्याह होता है

मन में तेरे क्या हलचल है बेहतर है कोई ना जाने
दुनिया को जब पता चले गुनाह तभी गुनाह होता है

मन में तेरे लाख हो उलझन जुल्फों को सुलझा के रख
मन की उलझन चेहरे तक लाना यहां गुनाह होता है

 बार बार इस दिल को क्या पाप पुण्य समझाते हो
 स्वर्ग नरक इस दिल के लिए शायद एक सा ही होता है

 भला बुरा सही गलत नहीं इस को समझ आने वाला
 दिल की तराजू में शायद एक ही पलड़ा बना होता है

Wednesday, December 2, 2009

तुम मेरी होती ना होती मै तो यूं तन्हा ना होता

कटने को अकेले भी मजे से कट रही थी जिन्दगी
सब उम्मीदे मर चुकी थी हर तमन्ना दफन थी
माना कोई खुशी ना थी लेकिन कोई गम भी ना था
जब तक ना तुम मुझ से मिली मै मिला तुम से ना था

तुम से क्या मिला कि हर उम्मीद जिन्दा हो गयी
सोच मेरी फिर से इक उडता परिन्दा हो गयी
सोये हुए अरमान सारे एक ही पल मे जग गये
हर दबी उमंग को फिर पख जैसे लग गये
मेरी उम्मीदे मेरी उमगे मेरी तमन्ना मेरे अरमा
मस्त होकर उड रहे थे सब खुले आकाश में
क्या हंसी नजारा था सारा गगन हमारा था
तुझको दिखाने के लिये मने तुझे पुकारा था
बस इक नज़र डाली थी तुमने उस भरे आकाश मे
मेरी तमन्ना मेरी उमंगे और मेरे विश्वास पे
फिर घायल पक्षी की तरह सब नीचे को गिरने लगे
कुछ तडफडाते गिर पडे कुछ गिरते ही मरने लगे

देखते ही देखते आकाश खाली हो गया
मानो किसी गरीब की रोटी की थाली हो गया

मै तो था उदास मगर तुम मुस्करा रही थी
अपने किये काम पे शायद बहुत इतरा रही
अलविदा कहते कह्ते दूर होती जा रही थी
काश वो नज़ारा मैने तुमको दिखलाया ना होता
तुम मेरी होती ना होती मै तो यूं तन्हा ना होता

Tuesday, December 1, 2009

मत भूलो की हर उड़ान इक रोज जमीं पे उतरनी है

एक उड़ान के भरते ही तुम हमको भुला बैठे हो सनम
 अभी ना जाने तुमको कितनी और उड़ाने भरनी हैं

जाने किस मंजिल पहुंचे जो बात चीत भी बंद हुई
तुमको तो जीवन में ऎसी कई मंजिल तय करनी है

वक्त के मारे इंसा से वैसे भी तुम्हे क्या मिलना था 
मन ग़म से बुझा तन उम्र ढला दो चीजे ही मिलनी हैं

मेरे ग़म को देख के अपनी आँखे नाहक नम ना कर
मेरे कारण अपनी खुशियाँ काहे को कम करनी है

पहली बार तुम दूर गयी तकलीफ कुछ दिल को ज्यादा हुई
 आख़िर तो दूरी सहने की आदत इक दिन हमें पदनी   है

तुम्हे तो उड़ने की खातिर आकाश भी छोटा पड़ता है
मेरे पास तो पांव रख पाने को जमीं ही मिलनी है

मुझ संग रह कर पंख तेरे और भी कम हो जाने थे
और तुझे गगन में उड़ने  की हसरत अभी पूरी करनी है 

औरो से ऊंचा उठने का अहसास सुखद होता है बहुत
पर मत भूलो की हर उड़ान इक रोज़ जमीं पे उतरनी है

Tuesday, August 25, 2009

इससे पहले ये तुम्हें मारे तूं इस को मार दे

मान लूँ कैसे अज़र है या अमर है आत्मा
 जब देखता हूँ हर कहीं हर रोज़ मरती आत्मा

 मार भी ना पाये तो इसको सुलाये रख सदा
 जागते ही ये दुखी तुझ को करेगी आत्मा

 सीख सकता है तो कुछ इन बड़े लोगो से सीख
 ताउम्र कौमा मे पड़ी रहती है जिन की आत्मा

ये कहीं का भी ना छोड़ेगी तुझे संसार मे
जितनी जल्दी हो सके तूँ आत्मा को मार दे

 पांव मे बैठा है क्या पहने हुये तू बेड़ीया
काट बेड़ी आत्मा की कदमों को रफतार दे

 देखना पछतायेगा और रोयेगा तू ज़ार ज़ार
 उतरा आत्मा का जिस भी दिन चढा बुखार ये

 इसकी तो आदत है देती पीछे से आवाज है
 आगे बढना है तो हर आवाज इसकी नकार दे

 फिर ना कहना मैने पहले तुमको चेताया नहीं
 इससे पहले ये तुम्हें मारे तूं इस को मार दे

Tuesday, August 18, 2009

इसकी तो आदत है देती पीछे से आवाज है

मान लूँ कैसे अज़र है या अमर है आत्मा
जब देखता हूँ हर कहीं हर रोज़ मरती आत्मा

 मार भी ना पाये तो इसको सुलाये रख सदा
जागते ही ये दुखी तुझ को करेगी आत्मा

सीख सकता है तो कुछ इन बड़े लोगो से सीख
 ताउम्र कौमा मे पड़ी रहती है जिन की आत्मा

ये कहीं का भी ना छोड़ेगी तुझे संसार मे
 जितनी जल्दी हो सके तूँ आत्मा को मार दे

 पांव मे बैठा है क्या पहने हुये तू बेड़ीया
 काट बेड़ी आत्मा की कदमों को रफतार दे

 देखना पछतायेगा और रोयेगा तू ज़ार ज़ार
 उतरा आत्मा का जिस भी दिन चढा बुखार

 ये इसकी तो आदत है देती पीछे से आवाज है
 आगे बढना है तो हर आवाज इसकी नकार दे

 फिर ना कहना मैने पहले तुमको चेताया नहीं
 इससे पहले ये तुम्हें मारे तूं इस को मार दे

Tuesday, August 11, 2009

कौड़ियों के मोल भी बिकता तो कोई गम ना था

फूल कम कान्टे ज्यादा गुलशन रहे किस काम के
खुशबु नहीं रंगत नहीं खिले फूल भी तो नाम के
चाह्त नहीं वफा नहीं रिश्तों मे बाकी क्या बचा
अब तो रिश्ते रह गये हैं सिर्फ नाम ही नाम के
हर शख्स ही बिकाऊ है इस दुनिया के बाजार मे
फर्क बस इतना है कौन बिकता है किस दाम पे
मह्फिल मे आ गये हो तो प्यासा ना वापिस जाईये
दो घूंट मुंह मे डाल लो, ना पी सको गर जाम से
जाने अभी ये दौर और क्या क्या दिखलाये हमे
क्या अभी से बैठना अपना कलेजा थाम के
इन नाम वाले लोगो को देखा है जब भी करीब से
अच्छे नजर आने लगे वो लोग जो बदनाम थे
किन उजालों की तमन्ना कर रहा है इन से तूँ
ये सुबह के सूरज नहीं ये हैं ढलते सूरज शाम के
मालूम है कि"ना" ही "ना" हर लफ्ज मे लिखेगा तूँ
बिन लिफाफा खोले वाकिफ हैं तेरे पैगाम से
कौड़ियों के मोल भी बिकता तो कोई गम ना था
गम ये है सब बिक गया बिन मोल के बिन दाम के

Monday, August 10, 2009

कौड़ियों के मोल भी बिकता तो कोई गम ना था

खिलने को तो चमन मे खिलते है फूल इससे क्या
खुशबू नहीं रंगत नहीं खिले फूल फिर किस काम के
चाह्त नहीं वफा नहीं रिश्तों मे बाकी क्या बचा
अब तो रिश्ते रह गये हैं सिर्फ नाम ही नाम के
हर शख्स ही बिकाऊ है इस दुनिया के बाजार मे
फर्क बस इतना है कौन बिकता है किस दाम पे
मह्फिल मे आ गये हैं तो प्यासा ना रख साकी हमें
दो घूंट मुंह मे डाल दे, ना पिला सके गर जाम से
जाने अभी ये दौर और क्या क्या दिखलाये हमे
क्या अभी से बैठना अपना कलेजा थाम के
इन नाम वाले लोगो को देखा है जब भी करीब से
अच्छे नजर आने लगे वो लोग जो बदनाम थे
किन उजालों की तमन्ना कर रहा है इन से तूँ
ये सुबह के सूरज नहीं ये हैं ढलते सूरज शाम के
मालूम है कि"ना" ही "ना" हर लफ्ज मे लिखेगा तूँ
बिन लिफाफा खोले वाकिफ हैं तेरे पैगाम से
कौड़ियों के मोल भी बिकता तो कोई गम ना था
गम ये है सब बिक गया बिन मोल के बिन दाम के

Friday, August 7, 2009

हर शख्स ही मुझ से बड़ा दिखने लगा है आजकल


जिन्दगी ने कल हमें फिर और इक झटका दिया
वक्त ने फिर हम पे बन्द इक और दरवाजा किया

जिसकी नजरों में, तमन्ना थी कि मेरा कद बढे
उसी की नजरों में गिरा मुझ को शर्मिन्दा किया

इनायत से ज्यादा यार जब करने लगे शिकायते
 समझ लो कि यारी टूटने का वक्त आ गया

दोस्त दुश्मन दोनों का हक वक्त ने यूँ किया अदा
पहले मिलाया और फिर मिलते ही उससे जुदा किया

जिन्दगी से जब भी कुछ उम्मीद पाने की जगी
 वक्त ने लाकर हमें फिर आईना दिखला दिया

 क्या मुकद्दर है मेरा और क्या मेरी तकदीर है
सामने थाली रही और अन्दर निवाला ना गया

नाकामियां बदनामियां कुछ और दामन में जुड़ी
 जब भी कोई नाकामी कम करने का हौंसला किया

हर शख्स ही मुझ से बड़ा दिखने लगा है आजकल
वक्त मेरे कद को किस हद तक बौना बना गया

मेरे मन दर्पण पे तूने फैंके हैं पत्थर,
 मगर टूटने से पहले उस मे अक्स तेरा समा गया

दीवानगी की देख हद खुद टूट कर भी शीशा दिल
अपने हर टुकडे मे तेरा अक्स पूरा बचा गया

Wednesday, August 5, 2009

करना है सब ने वही जो रास जिसको आयेगा

सोचते थे ये अकेलापन हमें खा जायेगा
क्या खबर थी ये अकेलापन हमें भा जायेगा
जीने को तो बिन तेरे भी जी ली हमने जिन्दगी
गम ये है कि कद तेरा बौना नजर अब आयेगा
सात जन्मों तक के रिश्ते की है करता बात क्या
इतना सोच इस जन्म तक कैसे ये निभ पायेगा
लादना अब छोड़ दे औरो पे अपनी सीख तूँ
कौन मानेगा तेरी और तुझसा कौन हो जायेगा
मन्जिलें तो मन मे सबके पहले से हैं बनी हुई
फिर तेरी खातिर कौन अपनी राह बदल पायेगा
ना प्यार ना हमदर्दी है, सब कुछ दिखावा है यहाँ
जितना जल्दी समझेगा तू उतना ही सुख पायेगा
अपने अपने तर्क सब ने गढ लिये अपने लिये
करना है सब ने वही जो रास जिसको आयेगा

Tuesday, August 4, 2009

याद करते है हम तो तुम्हें रात दिन

तेरे दिल मे भी है तेरे कदमों मे भी
जाने क्यों फिर नजर तुझ को आते नहीं
प्यार करते है जान से भी ज्यादा तुम्हें
बात इतनी है बस हम बताते नहीं
याद करते है हम तो तुम्हें रात दिन
है खता ये कि तुम को जताते नहीं
बात किससे करें कोई अपना तो हो
गैर लोगो से कुछ बतियाते नहीं
सामने किसके आयें कोई चाह्ता तो हो
बेवजह वक्त किसी पे लुटाते नहीं
सब तमाशाई बन शोर करते बहुत
खुद करके मदद क्यों बचाते नहीं
झूठी हमदर्दी है झूठा सा प्यार है
कष्ट थोड़ा भी लोग खुद उठाते नहीं
कुछ गवाना पड़े ना और सब कुछ मिले
ऐसे नाता किसी से निभाते नहीं
डूबना ही जिसे तकदीर लगने लगे
भीड़ तमाशाईयों की वो लगाते नहीं

Monday, August 3, 2009

जब तक दुर्योधन जिन्दा है तूँ लड़े बिना नहीं रह सकता

ये जीवन इक समझौता है हर बार मुझे समझाते हो
सच कहो तो कितने समझौते तुम खुशी खुशी कर पाते हो
जो टीस सी दिल में छोड़ जाये वो समर्पण है समझौता नही
जो चाहे नाम दो तुम इसको मुझसे तो ये सब होता नहीं
ये जीवन है, शतरंज नहीं, यहां नही बराबर छूटोगे
यहां समझौता मुमकिन ही नही या हारोगे या जीतोगे
जीत भी सच है हार भी सच है झूठ सिर्फ समझौता है
आन्खे मूंदना घुटने टेकना क्या ये समझौता होता है
आशावाद तो लड़ना है जब तक जीत नहीं वरते
वो क्या बाजी जीतेंगें जो सदा हार से रहे हैं डरते
वो शख्स जो बातों बातों मे समझौता करते फिरते हैं
या तो वो हारे होते हैं या फिर वो हार से डरते हैं
जीवन है महा संग्राम यहां हर मोड़ पे जंग है छिडी हुई
लड़ना ही तेरी नियति है तुझे समझौते की क्यों पड़ी हुई
जब तक दुर्योधन जिन्दा है तूँ लड़े बिना नहीं रह सकता
इसे धर्मयुद्ध ही मान के लड़ गर हार जीत नहीं सह सकता

Wednesday, July 29, 2009

हार को समझौते का नाम देकर इस जीत का रंग ना दो

जागती आन्खे बन्द कर सपने देखने का मै आदी नहीं
चाहो तो कह सकते हो मै तुम सा आशावादी नहीं
जब तक शीशा देखा ही नहीं क्या पता कि सूरत कैसी है
कागज पे उतारो तो जाने मन मे बसी मूरत कैसी है
ऐसा वैसा जैसा भी है सच तुम्हे मानना ही होगा
आज नहीं तो कल इस नगें सच का सामना भी होगा
यथार्थ को तुम निराशा कहो ये बात समझ मे आती नही
बन्द आँख कर लेने पर बिल्ली क्या कबूतर खाती नही
बेहतर है कबूतर उड जाये और उड कर जान बचा डाले
या फिर चोन्चे मार मार बिल्ली को घायल कर डाले
सच देख के आन्खे बन्द ना कर सच सच है ये सच मान ले तूँ
हो सके तो सच को लड़ के जीत क्यों उसको नियति मान ले तूँ
जीवन है अगर संग्राम तो फिर तुम मरोगे या तो मारोगे
और जीवन है संघर्ष तो फिर तुम जीतोगे या हारोगे
इस जंग से बच सकते ही नहीं या झुकना है या झुकाना है
हारे तो समर्पण करना है जीते तो फिर करवाना है
हार को समझौते का नाम देकर इस जीत का रंग ना दो
हार गये तो हार गये इस हार से क्या घबराना है
हार भी सच है जीत भी सच है झूठ सिर्फ समझौता है
आँखे बन्द कर ख्वाब देखना आशावाद कब होता है
आशावाद तो लडना है जब तक जीत नहीं होती
समझौता घुटने टेकना है बाद इसके जीत कहाँ होती

Tuesday, July 28, 2009

प्यार करते हो तो सरेआम कहो करते हैं


प्यार में दर्द का अहसास ही कब होता है
प्यार जब आधा अधूरा हो ये तब होता है

दर्द जब हद में रहे तब ये रूलाता है बहुत
दर्द जब हद से गुजर जाये दवा होता है

प्यार तड़पाता,रुलाता है,सताता है बहुत
प्यार जो अपने ही दायरों मे घिरा होता है

प्यार जब हद से गुजर जाये तो फिर क्या कहना
प्यार में सारे जमाने का मजा होता है

प्यार में रोने रूलाने का चलन है तब तक
जब ये अपनी ही जंजीरो मे बंधा होता है

अपने संस्कारो की जंजीरे जरा तोड़ के देख
अपने दायरों से निकल अहम जरा छोड़ के देख

प्यार करते हो तो सरे आम कहो करते हैं
यार से साफ कहो तुम पे बहुत मरते हैं

कोई भी अहम तूँ आड़े ना आने दे कभी
रूठ के प्यार को तूँ दूर ना जाने दे कभी

खा कसम  डर या वहम दिल मे ना तेरे आयेगा
तूँ कदम आगे बढा जहाँ खुद पीछे ह्ट जायेगा

हाँ ये हो सकता है कुछ चर्चे रहें दो चार दिन
इससे ज्यादा तूँ बता कि और क्या हो जायेगा

थोडी ताकत थोड़ी सी हिम्मत जुटानी है तुम्हें
प्यार तेरी सारी दुनियां को हसीं कर जायेगा

वो कहेगा कब कहेगा इसका ना इंतजार कर
तुम कहोगे पहले तो इसमें तेरा क्या जायेगा

तेरे दामन के पकड़ने में ही दिखती ढील है
वरना क्या हिम्मत जो वो दामन छुड़ा ले जायेगा

Monday, July 27, 2009

वो कहेगा कब कहेगा इसका ना इंतजार कर


प्यार में दर्द का अहसास ही कब होता है
प्यार जब आधा अधूरा हो ये तब होता है

दर्द जब हद में रहे तब ये रूलाता है बहुत
दर्द जब हद से गुजर जाये दवा होता है

प्यार तड़पाता,रुलाता है,सताता है बहुत
प्यार जो अपने ही दायरों मे घिरा होता है

प्यार जब हद से गुजर जाये तो फिर क्या कहना
प्यार में सारे जमाने का मजा होता है

प्यार में रोने रूलाने का चलन है तब तक
जब ये अपनी ही जंजीरो मे बंधा होता है

अपने संस्कारो की जंजीरे जरा तोड़ के देख
अपने दायरों से निकल अहम जरा छोड़ के देख

प्यार करते हो तो सरेआम कहो करते हैं
यार से साफ कहो तुम पे बहुत मरते हैं

अपना कोई अहम तूं आड़े ना आने दे कभी
प्यार को रूठ के  दूर ना  जाने दे कभी

खा कसम डर या वहम दिल मे नहीं आयेगा
तूँ जरा  आगे तो बढ़  पीछे जहाँ हट जायेगा

हाँ ये हो सकता है  कुछ चर्चे रहें दो चार दिन
तूँ बता कि इससे ज्यादा और क्या हो जायेगा

थोडी ताकत थोड़ी सी हिम्मत जुटानी है तुम्हें
प्यार तेरी सारी दुनियां को रगीन  कर जायेगा

वो कहेगा कब कहेगा इसका ना इंतजार कर
तुम कहोगे पहले तो इसमें तेरा क्या जायेगा

तेरे दामन के पकड़ने में ही दिखती ढील है
वरना क्या हिम्मत जो वो दामन छुड़ा ले जायेगा

Friday, July 24, 2009

गैरत ज्यादा दिन बचे , मुमकिन नहीं

आप क्या महफिल में आये, उठके सब चलने लगे
 चिराग कुछ बुझने लगे , जिस्म कुछ जलने लगे

 ज्यादा पीकर के बहकते, कुछ समझ आता हमें
आप तो दो चार घूँट, पीकर ही बहकने लगे

कातिल नशा है शराब में या साकी तेरे शबाब में
उसे पी के खोये होश तो , तुझे देख सब मरने लगे

है कैसी ये शराब और महफिल का साकी कैसा है
ना पी तो लड़खड़ाये सब और पी तो संभलने लगे

मेरी ना को तूँ ना ही समझ ये झूठीमूठी ना नहीं
 हम वो नहीं जो इसरार से "ना" "हाँ "मे बदलने लगे

मेरी सोई गैरत को, ललकारा उसने इस तरह
ना चाह कर भी प्यासे ही मह्फिल से हम चलने लगे

प्यासा भी है रहना पड़ा ,खाली भी लौटे है बहुत
 महफिल के सब दस्तूर, साकी, अमल करने लगे

गैरत ज्यादा दिन बचे लगता ये   मुमकिन नहीं
जेब भी खाली हो  और जब प्यास भी बढने लगे

Thursday, July 23, 2009

कितनी तकलीफ हुई होगी, सोचो तो जरा

कितनी तकलीफ हुई होगी, उस शख्स को, तुम सोचो तो जरा
 जिसे सफर के अन्त में पता चले वो जितना चला बेकार चला
 मन्जिल हो अभी भी दूर खड़ी , और खत्म हुआ जिसका रस्ता
 मन्जिल ने हो जिस राही से कहा, नादान, तूँ नाहक दौड़ा किया
 मुझ तक कोई राह नहीं आती , तूँ मुझ तक पंहुच नहीं सकता
 मेरे चारों और मीलों खाई, कोई जिसको लाँघ नहीं सकता
 राही भी अजब दीवाना था , अपनी धुन में मस्ताना था
उस राही ने मन्जिल से कहा, काहे को रही इतना इतरा
जिस हद तक आता था रस्ता, उस हद तक तो मैं आ पंहुचा

तुम चाहती तो बाकी दूरी पल भर में ही मिट सकती थी
इक कदम बढ़ाना था तुमको, मुझको मन्जिल मिल सकती थी
 लेकिन तुमने चाहा ही नहीं, मेरे चाहने से होना था क्या
 आगे का सफर संभव ही नहीं ना तुम चाहो , ना चाहे खुदा,
आया तो बड़ी चाहत से था अबअनचाहे मन लौट चला
फिर भी तेरे जीवन में कभी इतना सूनापन आ जाये
 ना राह दिखे ना राही ही और तूँ खुद से घबरा जाये
 तब अहम किनारे पे रख के इक बार पुकारना धीरे से
 उस रोज भी तेरा दिवाना , तेरे आसपास मिल जायेगा
वीरान पड़ी तेरी राहों का, फिर से राही बन जायेगा
 आखिर तो तेरा दीवाना है तुझ पे ही जान लुटायेगा

जी हाँ कभी ये शहर था फिर जाने क्या चली हवा

उपयोगिता तय करती है रिश्तों की नजदीकियां
आदमी भी आजकल सामान बनता जा रहा है

 व्यक्तितव से ज्यादा महत्व उपयोगिता का हो गया
 कद नापना इन्सान का आसान बनता जा रहा है

 देख कर इन्सान का इन्सान बन पाना कठिन
जिसको देखो आजकल भगवान बनता जा रहा है

लोग कहते है कि उसके दर पे है मिलता सकून
मेरे अन्दर फिर ये क्यों तूफान बनता जा रहा है

 किस के सिर पे पांव रख अब आगे बढेगा तूँ बता
 धरती का हर टुकड़ा जब आसमान बनता जा रहा है

 कल जहाँ कुछ भी ना था वहाँ आज छत तैयार है
 शायद बिना बुनियाद के मकान बनता जा रहा है

 खून का रिश्ते तो अब पानी से पतले हो गये
खून इक मिटती हुई पहचान बनता जा रहा है

पहले जो कदमों की आहट तक से था पहचानता
 अब वो मेरी शक्ल से अन्जान बनता जा रहा है

 ताकि उसकी इनायतों को भूल ना जाऊं कहीं
जख्म भर चला है पर निशान बनता जा रहा है

 जी हाँ कभी ये शहर था फिर जाने क्या चली हवा
 अब जिन्दा लाशों का ये कब्रिस्तान बनता जा रहा है

Tuesday, July 21, 2009

देखता हूं आईना तो महसूस होता है मुझे

जिन्दगी के मायने हैं अब समझ आने लगे
 इक इक कर जब छोड़ के सब हमे जाने लगे

 देखता हूं आईना तो महसूस होता है मुझे
सीने मे द्फन गम हैं चेहरे पे नजर आने लगे

 हमने जिन हाथों मे अक्सर फूल थमाये कभी
 वो हाथ अब सर पे मेरे पत्थर हैं बरसाने लगे

 देखा जब सीने मे नये जख्मो की जगह नहीं
दोस्त कान्टो से पुराने जख्म सहलाने लगे

किस किस्म के बीज थे जाने कैसी जमीन थी
 पोधो पे फूलो की जगह कान्टे नजर आने लगे

 ना कहें बदकिस्मती तो क्या कहे तू ही बता
 जब दोस्त सारे दुश्मनी कि रस्म निभाने लगें

 दूरी की बात और थी नजदीक जब गये कभी
ऊन्चे कद वाले सभी बौने नजर आने लगे

यूँ मानने को मान लेता हू तेरी हर बात मैं
 वैसे  तो हर बात तेरी मुझ को बेमायने लगे

अब हमारे बचने की उम्मीद बचती है कहां
हमको बचाने वाले है खुद को बचाने मे लगे

खेत मे तू ही बता कोई फसल बचती हैं कभी
 खेत की जब बाड़ खुद ही खेत को खाने लगे

Thursday, July 16, 2009

क्श्ती कोई किनारे क्यों लगती नही है अब

पहले सा प्यार करने वाले दिल नही रहे
या हम किसी के प्यार के काबिल नही रहे

क्श्ती कोई किनारे क्यों लगती नही है अब
माझी नहीं रहे या फिर साहिल नही रहे

तुमने तो"ना "ही कहनी है हर एक सवाल पर
अब तेरे जवाब जानने मुश्किल नही रहे

दु:ख मे शरीक होना महज रस्म बन गया
दुख बांटने वाले उनमें शामिल नही रहे

पढ लिखके सीखा क्या बता खुदगर्जी के सिवा
और मानने लगे कि अब जाहिल नहीं रहे

कोई इश्क से कहो उतारे नजर हुस्न की
सुनते हैं उनकी गालों पे अब तिल नहीं रहे

 सुर्खो सफेद मिटटी की मूरत ही तो बची
 गर हुस्न मे जज्बात कुछ शामिल नही रहे

 साकी रहे, मीना रहे और जाम रहना चाहिये
 महफिल रहे या फिर कोई महफिल नही रहे

Saturday, July 11, 2009

रात का अन्धेरा ही निगल गया जिस शख्स को

अह्सास ही जब मर गया रिश्ते मे बाकी क्या बचा
 खोखला रिश्ता उम्र भर चलना क्या ना चलना क्या

 सारा सफर तन्हा कटा तो खत्म होते सफर मे
तूं बता हमसफर का मिलना क्या ना मिलना क्या

 रात का अन्धेरा ही निगल गया जिस शख्स को
 उसके लिये सू्रज सुबह निकलना ना निकलना क्या

कहने को डूबते को तिनके का सहारा है बहुत
दरअसल इतना  सहारा मिलना या  ना मिलना क्या

मरीज ए इश्क चल बसा तो हुस्न बेपर्दा हुआ
हुस्न का यूँ बेनकाब निकलना ना निकलना क्या

Tuesday, July 7, 2009

दम तोडते पोधे पे कलियों खिलना क्या ना खिलना क्या

तार तार हो चुका दामन तो उसका सिलना क्या
 फर्क दिल मे रख किसीका मिलना क्या ना मिलना क्या

 जब गिर गये इतना कि नरक तक भी छोटा पड गया
 बन्दे का उसके बाद संभलना क्या ना सभलना क्या

 इस तरह गुलशन कभी आबाद होते है भला
 दम तोडते पोधे पे कलियों खिलना क्या ना खिलना क्या

कब्र ही अन्जाम है गर हर खवाहिश का मेरी
फिर नयी खवाहिश का मन मे पलना क्या ना पलना क्या

 उठ गया है जामो मीना साकी भी जाने को है
महफिल मे अब नादाँ किसीका आना क्या निकलना क्या

 जब जानते हो चान्द धरती पर उतर सकता नही
 बच्चों की तरह चान्द पा लेने को फिर मचलना क्या

 कट गयी जब रात सारी रोशनी के बिन मेरी
 अब किसी दीये का यारा बुझना क्या और जलना क्या

Tuesday, June 30, 2009

देखे है आसमा मे जब से उडते परिन्दे

दामन छुडाने मे ना हो तकलीफ़ किसी को
हमने कफ़न तन्हाई का खुद ओढ लिया है

महफिल मे जाके भी हमें तन्हा ही रहना है
ये सोच महफिलों मे जाना छोड दिया है

ना आगे ना पीछे ना कोई साथ है मेरे
रिश्तों की लाशें जब से ढोना छोड दिया है

इन जहाँ वालो की परवाह कौन करता था
 ग़म  है तो बस   इतना  की तुमने  छोड दिया है

इक रिश्ता ए उम्मीद बचा था किसी तरह
क्यों आखिरी रिश्ता भी आज तोड दिया है
नफरत करे तुमसे ना जब हमसे हुआ मुमकिन
किसी तरह बस प्यार करना छोड दिया है
जब भी लगा मन्जिल कोई नसीब मे नही
राहों को हमने खुद ही नया मोड दिया है
डूबना उस कश्ती की तकदीर बन गयी
माझी ने जिसे बीच भवर छोड़ दिया है
और ना बढ जाये मिटती प्यास इस दिल की
अब खाली जाम होठो से लगाना छोड दिया है
देखे है आसमा मे जब से उडते परिन्दे
 पिन्जरे को अपना घर समझना छोड दिया है

पंखो को मेरे बांध कर सब ने कहा उडो
हकीकत से किस कदर मुँह सबने मोड़ लिया है
इतनी बडी सजा के तो हकदार हमने थे
ये किसका गुनाह नाम मेरे जोड दिया है

अब तो दवा लाना तेरा बेकार हो गया
कब का मरीजे ए इश्क ने दम तोड़ दिया है

Monday, June 29, 2009

कब का मरीजे ए इश्क ने दम तोड़ दिया है

वो साथ ले चले मगर सामान की तरह
जरूरत नही रही तो बीच राह छोड दिया है

दामन छुडाने मे ना हो तकलीफ़ किसी को
हमने कफ़न तन्हाई का खुद ओढ लिया है

महफिल मे जाके भी हमें तन्हा ही रहना था्
ये सोच महफिलों मे जाना छोड दिया है

ना आगे ना पीछे ना कोई साथ है मेरे
 रिश्तों की लाशें जब से ढोना छोड दिया है

 इन जहाँ वालो की परवाह कौन करता था
 ग़म तो है ये कि तुमने हमे छोड दिया है

इक रिश्ता ए उम्मीद बचा था किसी तरह
लो आखिरी रिश्ता भी आज तोड दिया है

नफरत करे तुमसे ना जब हमसे हुआ मुमकिन
मजबूरन ही तुमसे प्यार करना छोड दिया है

जब भी लगा मन्जिल कोई नसीब मे नही
राहों को हमने खुद ही नया मोड दिया है
डूबना उस कश्ती की तकदीर बन गयी
माझी ने भी जिसे बीच भवर छोड़ दिया है

और भी बढ जाये जिससे प्यास इस दिल की
वो जाम होठो से लगाना छोड दिया है

 पंखो को मेरे बांध कर तुमने कहा उडो
 हकीकत से किस कदर मुँह तुमने मोड़ लिया है

 इतनी बडी सजा के तो हकदार हम न  थे
 ये किसका गुनाह नाम मेरे जोड दिया है

अब तो दवा लाना तेरा बेकार ही गया
 कब का मरीजे ए इश्क ने दम तोड़ दिया है

Monday, June 22, 2009

जो ठीक लगे सो करता जा ना इसकी सुन ना उसकी सुन

जो भी चाहे तूँ मंजिल चुन जो भी चाहे तूँ सपने बुन
 जो ठीक लगे सो करता जा ना इसकी सुन ना उसकी सुन

सब हासिल हो सकता है गर खुद मे पैदा कर ले
मंजिल को पाने की धुन राहो पे चलने का गुण

नाकामयाब इन्सान सदा किस्मत का रोना रोता है
 सोचता है  मिलता है वही किस्मत में जो लिखा होता है

नहीं सोचता आम मिले कैसे जब पेड बबूल के बोता है
अपने कर्मो का फल ना मिले ऐसा तो कभी नहीं होता है

 केवल इच्छा है पाने की नहीं हिम्मत दाँव लगाने की
 ऐसा शख्स तो हर बाजी पहले से ही हारा होता है

चाहत रख लेने   भर से किसे कहाँ मिलती मंजिल
मंजिल के लिये तो चलते रहो तब ही गुजारा होता है

Friday, June 19, 2009

तूँ ही बता कि पास तेरे आके मुझ को क्या मिला

पास तेरे आके तुझ से दूर हो जाता हूँ मै
 क्या बताऊं किस कदर मजबूर हो जाता हूँ मै

मिल के भी तुझ से कभी मिल नहीं पाता हूँ  मै
 जब ये समझ आता नहीं फिर मिलने क्यों आता हूँ मैं

बात कर सकता हूँ पर हर बात कर सकता नहीं
जाहिर तुम पे मै कोई जज्बात कर सकता नहीं

पर दूर तुझसे रहके तेरे पास आ जाता हूँ मै
अपनी मनमर्जी का मालिक खुद को तब पाता हूं मै

 ना इजाजत चाहिये ना पूछनी मर्जी तेरी
 जी में जो आता है सब बेखौफ कर जाता हूँ मै

पास तेरे रहके तुझ को छूना तक मुमकिन नहीं
 पर दूर तुझ से रह तेरी बाहों में आ जाता हूँ मै

 दिलका हर इक दर्द तब तुझसे मै बांट पाता हूँ
मन की हर इक बात तब तुझ से कर जाता हूँ मैं

अठखेलियां करना भी तब तुझको बुरा लगता नहीं
 पास में और दूर में कितना फर्क पाता हूँ मैं

तूँ ही बता कि पास तेरे आके मुझ को क्या मिला
 दूर तुझसे रह के फिर भी कुछ तो पा जाता हूँ मै

 नजदीक रहके इस कदर रखनी क्या इतनी दूरींया
 कहने को साथी साथ है और तन्हा हो जाता हूँ मै