Wednesday, February 13, 2008

सफर का अन्त

कितनी तकलीफ हुई होगी, उस शख्स को, तुम सोचो तो जरा
 जिसे सफर के अन्त में पता चले , वो जितना चला बेकार चला
मन्जिल हो अभी भी दूर खड़ी , और खत्म हुआ जिसका रस्ता
मन्जिल ने हो जिस राही से कहा, नादान, तूँ नाहक दौड़ा किया
मुझ तक कोई राह नहीं आती , तूँ मुझ तक पंहुच नहीं सकता
 मेरे चारों और मीलों खाई, नहीं जिसको लाँघ कोई पाता
 राही भी अजब दीवाना था , अपनी धुन में मस्ताना था
उस राही ने मन्जिल से कहा, काहे को रही इतना इतरा
 जिस हद तक आता था रस्ता, उस हद तक तो मैं आ पंहुचा
तुम चाहती अगर, बाकी दूरी ,पल भर में ही मिट सकती थी
इक कदम बढ़ाना था तुमको, मुझको मन्जिल मिल सकती थी
 लेकिन तुमने चाहा ही नहीं, और मेरे चाहने से होना था क्या
आगे का सफर संभव ही नहीं , ना तुम चाहो , ना चाहे खुदा
, आया तो बड़ी चाहत से था मैं, पर, अन चाहे मन लौट चला
 फिर भी तेरे जीवन में कभी इतना सूना पन आ जाये
ना राह दिखे ना राही ही , और तूँ खुद से घबरा जाये
 तब अहम किनारे पे रखना , इक बार पुकारना धीरे से
उस रोज भी तेरा दिवाना , तेरे आसपास मिल जायेगा
वीरान पड़ी तेरी राहों का, फिर से राही बन जायेगा
आखिर तो तेरा दीवाना है , कहाँ तुझ बिन जान गंवायेगा

4 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत सुंदर ।

Krishan lal "krishan" said...

कविता सरहाने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया आशा जी। कृप्या आगे भी इस ब्लाग पर आते रहें। आप के सुझावों का भी स्वागत हैं। पुन: धन्यवाद

mehek said...

bahut khub

Krishan lal "krishan" said...

I am so happy. Thanks a lot mehek ji.