Monday, October 20, 2008

इक कदम गलत पडा क्या जिन्दगी की राह में

जिन्दगी के अर्थ हॆं जब से समझ आने लगे
 जिन्दगी तेरे नाम से हम तो घबराने लगे
 हम से हुआ गुनाह तो बात सबकी बन गयी
 कल के गुनाह्गार मुनसिफ बन के इतराने लगे
 इक कदम गलत पडा क्या जिन्दगी की राह मे
 खुद लडखडाते लोग हमें संभलना सिखलाने लगे
 इक हवा के झॊके ने किया तिनका तिनका आशियां
जिसको बनाने मे थे हमको कितने जमाने लगे
 क्या गिला अब कीजीये ऒर क्या शिकायत हम करें
 अप को जब हम से ज्यादा गॆर हॆं भाने लगे
 ये भी कोई यार का यार से मिलना हुआ
यार जब आते ही रट जाने की लगाने लगे
आप तो सुनते ही मेरी बात मुस्काने लगॆ
जाने किस मुश्किल से मुश्किल हम थे बतलाने लगे
 दोस्तो ने दोस्ती मे गम दिये तो इस कदर
 जितने दुश्मन थे हमें अपने नजर आने लगे

4 comments:

रंजना said...

waah ! sundar gazal hai.

विनय said...

इक कदम गलत पडा क्या जिन्दगी की राह मे
खुद लडखडाते लोग हमें संभलना सिखलाने लगे

हमारी-आपकी ज़िन्दगी से बहुत क़रीब का शे'र, बहुत ख़ूब!

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

"Arsh" said...

हम से हुआ गुनाह तो बात सबकी बन गयी
कल के गुनाह्गार मुनसिफ बन के इतराने लगे

is sher ke padhane ke bad to kuch bacha hi nahi kahane ko..

aapka mere blog pe bahot swagat hai,kripya padharen...