Monday, August 10, 2009

कौड़ियों के मोल भी बिकता तो कोई गम ना था

खिलने को तो चमन मे खिलते है फूल इससे क्या
खुशबू नहीं रंगत नहीं खिले फूल फिर किस काम के
चाह्त नहीं वफा नहीं रिश्तों मे बाकी क्या बचा
अब तो रिश्ते रह गये हैं सिर्फ नाम ही नाम के
हर शख्स ही बिकाऊ है इस दुनिया के बाजार मे
फर्क बस इतना है कौन बिकता है किस दाम पे
मह्फिल मे आ गये हैं तो प्यासा ना रख साकी हमें
दो घूंट मुंह मे डाल दे, ना पिला सके गर जाम से
जाने अभी ये दौर और क्या क्या दिखलाये हमे
क्या अभी से बैठना अपना कलेजा थाम के
इन नाम वाले लोगो को देखा है जब भी करीब से
अच्छे नजर आने लगे वो लोग जो बदनाम थे
किन उजालों की तमन्ना कर रहा है इन से तूँ
ये सुबह के सूरज नहीं ये हैं ढलते सूरज शाम के
मालूम है कि"ना" ही "ना" हर लफ्ज मे लिखेगा तूँ
बिन लिफाफा खोले वाकिफ हैं तेरे पैगाम से
कौड़ियों के मोल भी बिकता तो कोई गम ना था
गम ये है सब बिक गया बिन मोल के बिन दाम के

5 comments:

एकलव्य said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .

AlbelaKhatri.com said...

waah
umdaa she'r
sach k she'r
_____________badhaai !

Krishan lal "krishan" said...

Eklavya ji

rachna ko pasand karne ke liye shukriya

Krishan lal "krishan" said...

khatri ji
kyaa baat kahi hai aapne hazoor. Bahut Bahut dhanyavaad

Rajeev kumar pandey said...

bhut jabardast rachnayen hein sir
agar waqt ho to please chek
www.rajeevkumarpandey.wordpress.com
thnks a lot