Thursday, March 13, 2008

क्यों हम को भुला बैठे हो सनम

एक उड़ान के भरते ही तुम हमको भुला बैठे हो सनम
 अभी ना जाने तुमको कितनी और उड़ाने भरनी हैं
 जाने किस मन्जिल पहुंचे हो जो बातचीत भी बन्द हुई
 तुमको तो जीवन मे ऐसी कई मन्जिल तय करनी है
 मुझ वक्त के मारे इन्सां से वैसे भी तुम्हें क्या मिलना था
मन गम से बुझा तन उम्र ढला यही चीजे तो मिलनी हैं
 मेरे गम को देख के अपनी आँखे नाहक नम ना कर
 मेरे कारण अपनी खुशियां तुझे काहे को कम करनी है
 पहली बार तुम दूर गयी तकलीफ हुई दिल को ज्यादा
 आखिर तो दूरी सहने की आदत इक दिन हमें पड़नी है
 मै ना तो मन्जिल हूँ तेरी ना ही राहों का साथी हूँ
 फिर मुझ से जुदा होने के लिये काहे को देरी करनी है
 तुम्हे तो उड़ने की खातिर आकाश भी छोटा पड़ता है
मेरे पास तो पाँव रख पाने को जमीँ ही मिलनी है
 मुझ संग रह कर पंख तेरे और भी कम हो जाने थे
और तुझे गगन मे उड़ने की हसरत अभी पूरी करनी है
 औरों से ऊँचा उठने का अहसास सुखद होता है बहुत
 पर मत भूलो कि हर उड़ान इक रोज़ जमीँ पे उतरनी है

6 comments:

indu said...

Bahut hi Badhiya.
Vah!

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा....बधाई..इस रचना के लिये.

Krishan lal "krishan" said...

उदन तशतरी जी

आपका आभारी हूँ इस रचना को पढ़ने और सरहाने के लिये । ्पुन: धन्यवाद

Krishan lal "krishan" said...

indu ji
Shaayad mere is blog par aap pahalii baar aayen hai.
aapka is blog par svaagat hai.

kavitaa ko pasand karane ke liye aapka bahut shukriyaa

Keerti Vaidya said...

ati sunder.......

Krishan lal "krishan" said...

कीर्ति वैद्य जी ,
बहुत बहुत शुक्रिया रचना को सुन्दर बता कर प्रोत्साहित करने के लिये