Thursday, May 28, 2009

इस दुनिया में, हर रिश्ते की , होती बुनियाद जरूरत है


ना प्यार कोई, ना वफा कोई, ना चाहत है, ना अपनापन
 इस दुनिया में, हर रिश्ते की , होती बुनियाद जरूरत है
बुनियाद ही क्या, इन रिश्तों की, बहुमंजिल खड़ी इमारत में
हर छत को संभाले खड़ी हुई ,इक इक दीवार जरूरत है
हालात की कोख से जन्मे हैं, तेरे मेरे सारे रिश्ते
इस दुनिया मे हर रिश्ते को करती ईज़ाद जरूरत है
जो चाहे नाम दो रिश्तों को कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला
है बात असल मे इतनी ही सब का आधार जरूरत है
यहाँ तेरी जरूरत की खातिर कोई तुझसे नहीं रखता रिश्ता
रिश्तों को बनाने में सब की अपनी ही कोई जरूरत है    
बदले हालात , तो छितरेंगे , तेरे मेरे सारे रिश्ते
रिश्तो को जो बान्धे रखती है, वो डोरी सिर्फ जरूरत है
ता उम्र निभाना रिश्तों का, मजबूरी है, कोई प्यार नहीं
रिश्ते ढोने ही पड़ते हैं, जब लगे कि इन की जरूरत है
कभी  सोचा है तेरा मेरा रिश्ता अब तक क्यों कायम है
कुछ तेरी ज़रूरत है हुमको कुछ मेरी तुझे ज़रूरत है 

1 comment:

महामंत्री - तस्लीम said...

बडी नफासत के साथ आपने रिश्तों का फलसफा अपनी गजल में पिरो दिया है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }