Wednesday, December 9, 2009

इस जीवन में पड़ते पड़ते कई पासे उलटे पड़ जाते हैं

रिहते टूटें साथी छूटे लेकिन तूं आंखें नम ना कर

पतझड़ के मौसम में अक्सर पेड़ से पत्ते झड़ जाते है

अपनी धुन में मस्त रहे हो नहीं सुनी कोई बात किसी की

अपनी तरह से जीने वाले यूं ही अकेले पड़ जाते हैं

ये देख के तुफाँ के आगे कभी टिक पाना आसान नहीं

घास तो अक्सर झुक जाता है पेड़ हमेशा अड़ जाते हैं

जिद्द छोडो तो बेहतर है , है वक्त संभलने का अब भी

तेज तुफाँ में अड़ने वाले अक्सर जड़ से उखड़ जाते की

माना तुम खिलाड़ी हो पक्के पर ये चौसर का खेल नहीं

इस जीवन में पड़ते पड़ते कई पासे उलटे पड़ जाते हैं

2 comments:

alka sarwat said...

माना तुम खिलाड़ी हो पक्के पर ये चौसर का खेल नहीं

मनोज कुमार said...

वैचारिक ताजगी लिए हुए रचना विलक्षण है।