Saturday, January 30, 2010

नही आज तो कल दिल का शीशा टूट जाना है जरूर

देखिये अब जिन्दगी रंग दिखलाती है क्या
वक्त ने खोला है फिरसे हम पे दरवाजा नया

 दोस्त या दुश्मन कहूं इस वक्त को तू ही बता
 यूँ तो मिलाता है मगर मिलते ही करता है जुदा

 जगती है उम्मीद कुछ पाने कि जब भी जिन्दगी से
 वक्त लाकर आइना हरबार   देता है दिखा

क्या मुकद्दर है मेरा और क्या मेरी तकदीर है
सामने थाली रही और अंदर निवाला ना गया

 हर शख्स ही मुझ से बड़ा दिखने लगा है आजकल
 वक्त ने कद मेरा किस हद तक बौना बना दिया

 नहीं आज तो कल दिल का शीशा टूट जाना है जरूर
यही  सोच कर तेरा अक्स हमने आत्मा में बसा लिया

तेरे लिए दीवानगी किस हद तक पहुंची है ये देख
 दिल टूटा लेकिन अक्स तेरा हमने पूरा बचा लिया

4 comments:

रंजना said...

दोस्त या दुश्मन कहूं इस वक्त को तू ही बता
यूँ तो मिलाता है मगर मिलते ही करता है जुदा..

Kya baat kahi waah !!! Sundar rachna...

ह्रदय पुष्प said...

दोस्त या दुश्मन कहूं इस वक्त को तू ही बता
यूँ तो मिलाता है मगर मिलते ही करता है जुदा

जगती है उम्मीद कुछ पाने कि जब भी जिन्दगी से
ये वक्त लाकर आइना हमको देता है दिखा

क्या मुकद्दर है मेरा और क्या मेरी तकदीर है
सामने थाली रही और अंदर निवाला ना गया

बहुत खूब - लाजवाब - यथार्थपरक रचना के लिए धन्यवाद्.

Krishan lal "krishan" said...

hriday pusp ji bahut bahut dharywaad is rachna ko psnd karne kle liye. mai to wo kehtaa hun jo maine gujaaraa hai aapko achhaa laga shukriyaa tumhaaraa hai.

Krishan lal "krishan" said...

Ranjnaa ji aap ke tippni ke liyee dil se dhanywaad. Aap blog par aate rahege to achha lagega.