Thursday, March 4, 2010

कौन है वो मेरा क्या है तुम ही कुछ बतलाओ

कौन है वो मेरा क्या है तुम ही कुछ बतलाओ
मेरा होकर भी मेरा नहीं क्या लगता है समझाओ

 दूर दूर रहते हैं लेकिन पास पास भी रहते हैं
 दिल की सारी बाते अक्सर इक दूजे से कहते हैं

 इक दूजे के काँधे पे सर रख कर हम रोये हैं
 इक दूजे का हाथ पकड़ अक्सर गलियों में खोये हैं

 दिल में समाये हैं हरदम बाहों में समाये कभी नहीं
 एक ही छत के नीचे अजनबी बन के भी हम  सोये हैं

एक ही  थाली ,एक कटोरी इक चम्मच से खाते हैं
इक दूजे के पोंछे आंसू जब भी हम रोयें हैं

घर का मालिक मै हूँ तो वो भी नहीं उसकी चेरी
तुम ही कहो कि कौन है वो और क्या लगती है मेरी

1 comment:

रानीविशाल said...

Sundar Abhivyakti......Shubhkaamnae!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/