Tuesday, March 18, 2008

अपने समुन्दर होने पे होगा तू इक दिन शर्मसार

तुम से मिल के जिन्दगी,सोचा था,संवर जायेगी
क्या खबर थी बात पहले से भी बिगड़ जायेगी

 हम तो वीराने में अपने आदतन खुश रह रहे थे था
 क्या पता गुलशन मे तेरे ये खुशी भी जायेगी

 फूलों का हकदार बनाना तो नामुमकिन ही था
 तूँ हमको फूलों की महक का हक भी ना दे पायेगी

 दिल कहां लगता है ऐसे गुलशन में तूँ खुद बता
गुल पे हक किसी और का,माली तूँ मुझको बनायेगी

 ना सही असली कुछ नकली महक तो तूँ डालती
 इन कागजी फूलों पे कब तक भंवरे को उलझायेगी

 समुन्दर के पानी की तरह हुस्न की मालिक हो तुम
 दो बून्द भी जिसकी किसी प्यासे के काम ना आयेगी

 अपने समुन्दर होने पे होगी तूँ उस दिन शर्मसार
प्यासे की प्यास ओस की बून्दों से जब बुझ जायेगी

3 comments:

अन्जलि said...

बहुत ही सुन्दर गजल ये शेर तो बहुत ही अच्छा लगा
अपने समुन्द्र होने पे होगा तूँ उस दिन शर्मसार
प्यासे की प्यास ओस की बून्दों से जब बुझ जायेगी

mehek said...

अपने समुन्द्र होने पे होगा तूँ उस दिन शर्मसार
प्यासे की प्यास ओस की बून्दों से जब बुझ जायेगीbahut hi sundar sher aur gazal

Krishan lal "krishan" said...

ehek ji aur anjali jii aap dono ka bahut bahut shukriyaa ghazal ko pasand karane ke liye aur khaas kar us sher ko pasand karne ke liye jo mera jindagi ke anubhavo se liyaa gayaa sher hai