तेरी गर्दन एक सुराही है तेरे होंठ है इक मय का प्याला
तेरे नयन हैं मय का स्त्रोत प्रिय तेरा स्पर्श बनाये मतवाला
जिसको भी देखा मुस्काके उसको ही घायल कर डाला
अब जाने खुदा या तू ही बता तूँ बला है या फिर है बाला
ये मय है या अमरत्व टपकता है तेरे इक इक अंग से
कभी लगे कि जिन्दा मार दिया कभी लगे अमर है कर डाला
किस किस अंग की तारीफ करू है नशा तेरे इक इक अंग में
तेरी चाल करे बेहाल चले तू इस ढंग से या उस ढंग से
कुछ होश नही रहता मुझको जब होता हूँ तेरे संग में
मुझ को तो नशीली लगती हो देखा तुमको जिस भी रंग में
कभी लगे तुँ एक सुराही है कभी लगे तूँ है मय का प्याला
कभी मुझ को नजर आती है तूँ सारी की सारी मधुशाला
जो भी है लेकिन ये तय है कि अब ये तेरा मतवाला
तेरी मह्फिल से प्यासा ही नहीं लौट के अब जाने वाला
मै कई वर्षों का प्यासा हूँ नही पीना इक दो जाम प्रिय
सारी की सारी मधुशाला तुम कर दो मेरे नाम प्रिय
ता उम्र जो प्यासा बैठा रहा उसे कुछ तो मिले ईनाम प्रिय
फिर उसके बाद चाहे तो खुदा बेशक कर दे मेरी शाम प्रिय
अन्जाम-ए-सफर इससे बेहतर क्या देखा फरिश्तों ने होगा
दम निकलेगा तेरी बाहों मे होंठों पे होगा तेरा नाम प्रिय
Saturday, March 22, 2008
जिसको भी देखा मुस्का के उसको ही घायल कर डाला
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6 comments:
सुन्दर रचना है।
आप को होली की बहुत-बहुत बधाई।
paramjit ji,ghazal ko pasand karane ke liye aapakaa bahut bahut shukriyaa.Holi ki aapako bhi badhaayee
कृष्ना लाल जी, आप ने तो लगता हे अपने दिल की बात को गजल का रुप दे दिया हे, ऎसी गजले तो पेग के साथ बहुत ही अच्छी लगती हे, धन्यवाद अच्छी गजल के लिये.
आप को ओर आप के परिवार को होली की बहुत बहुत बधाई.
आपको होली बहुत-बहुत मुबारक.
अच्छा है. होली की बधाई.
राज भाटिया जी, उड़न तशतरी जी,एव मीत जी आप सब का बहुत बहुत शुक्रिया गजल पसन्द करने के लिये एवं होली की शुभ कामनाये भेजने् के लिये, आशा है आप सबने होली खूब अच्छी मनाई होगी
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