Wednesday, April 2, 2008

जब घर मे तेरी चूड़ी का टूटा हुआ टुकड़ा मिला

मैने तुम से कब कहा कि तुम हो सनम बेवफा
क्यों सुना रहे हो फिर मजबूरियों की दास्ताँ
 पर ये भी कोई यार का यार से मिलना हुआ
 एक इक कदम आगे बढ़ा तो दूजा दो पीछे हुआ
 काफी था राहों में मिलना घर बुला के क्या हुआ
घर में भी जब तू मिला तो फासले रख के मिला
 जिस्मो का स्पर्श तो मानो अनहोनी बात थी
 हाथों को हाथ छू गया तो भी तुझे हुआ गिला
 दूरीयां कायम रही और रात सारी कट गई
किस कदर तहजीब से इक यार यार से मिला
 पर कौन मानेगा मेरी कि फासले कायम रहे
 जो घर में तेरी चूडी का टूटा हुआ टुकडा मिला
 पास रह के इतनी दूरी और अब मुमकिन नहीं
 इतनी दूरी रखनी है तो फिर तूँ दूर ही भला
 बातों से बात बनने वाली है नही मेरे हजूर
प्यार है तो प्यार कर या खत्म कर ये सिलसिला

4 comments:

अन्जलि said...

बहुत ही अच्छी गजल एक अलग अन्दाज में खास कर ये दो शेर

दूरीयां कायम रही और रात सारी कट गई
किस कदर तहजीब से इक यार यार से मिला

पर कौन मानेगा मेरी कि फासले कायम रहे
जो घर में तेरी चूडी का टूटा हुआ टुकडा मिला

Krishan lal "krishan" said...

शुक्रिया अन्जली जी गज़ल को पसन्द करने के लिये

Udan Tashtari said...

बेहतरीन गजल!!

Krishan lal "krishan" said...

shukriya udan tashtri ji