Thursday, May 22, 2008

कवि मित्र से

मेरे एक मित्र हैं दिखने मे तो, ठीक ठाक दिखते हैं फिर भी , जाने क्यों , कविताएं लिखते हैं एक दिन पूछ ही लिया कि मित्र ये तो बता ये यूँ ही लिखते रहते हो या तुम्हे कुछ है मिलता कहने लगे तुम्हे नहीं मालूम कविताए लिखने से मिलता है अदभुत सुख, शान्ती और सकून मैने कहा मित्र , ये बात तो नहीं जमीं तुम्हारे जीवन मे क्या सचमुच इन तीनों की है इतनी कमी तो कहने लगे मित्र अगर इन तीनों का एक अंश भी मेरे जीवन में होता तो मै भी होता एक समान्य इन्सान कवि नहीं होता अरे कवि तो बनता ही है तभी जब दिमाग मे उठी हो कोई खलबली या फिर मन मे हो अशान्ति कारण कोई भी हो आफिस मे चैन ना हो या घर में हो क्रान्ति व्यवस्था में कमी हो या समाज मे हो कोई खराबी उसे हर समस्या रूपी ताले की कविता ही नज़र आती है चाबी

मैने कहा मै समझ गया कवि कौन बन पाता है आदमी ,जब अपनी सोच और अपने वातावरण मे तालमेल नहीं बिठा पाता है जब व्यवस्था को बदलने की क्षमता या साहस नहीं जुटा पाता है ना समाज को बदलना लगता है संभव न खुद को बदल पाता है तब वो कवि बन जाता है मैने मित्र से फिर कहा मित्र एक प्रश्न तो अभी भी बचा रहा ये जो कविताए इतनी मेहनत से तूँ गढ़ता है आखिर इन्हें कौन पढ़ता है पढना, समझना या प्रेरणा पाना तो दूर आम आदमी तो कविता के नाम से ही चिढता है

कवि मित्र बोले, मित्र तूँ नहीं जानता कवियों की जात को नहीं पहचानता हर कवि को कोई ना कोई और कवि मिल जाता है जब उसकी कविता कोई नही पढता

तब वो अन्य कवियों को पढ़ उन पर टीका टिप्प्णी कर आता है

उनमे से कुछ कवियो को

इस कवि का ख्याल आ जाता है

और इस तरह हर कवि को कोई ना कोई पाठक मिल ही जाता है

6 comments:

apurn said...

bas ek kavi ko he kaviyon ki khichayi karne ka adhikar hai
is adhikar ka sahi pryog kar rahe hain aap :-)

shayad kai bindoovon pe har koi sahmat nahin hoga kyuki har kisi ki apni soch hai.....
par achhi kavita hai

Krishan lal "krishan" said...

apurn ji
aap kaa bahut bahut shukriya kavita ko achhaa kahane ke liye. Jahan tak logo ke sahamat hone naa hone kaa prashan hai to vo koi pharak nahi padataa kyonke har vayakati ko apani soch rakhane ka aadhikaar hai.
Vaise meraa ashay kisii kavi ki khinchayee karnaa nahi hai . Bus vichaar aayaa aur kaagaj par utaar diyaa.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

लीजिए आपकी कविता को भी एक पाठक मिल गया.. लेकिन ये कवि, कवि होने पहले एक पाठक है.. जिस प्रकार एक अच्छा श्रोता ही अच्छा वक्ता होता है. ठीक उसी प्रकार एक अच्छा पाठक ही अच्छा लेखक बन सकता है.. तो आप ये ना समझे की कवियो को कवि ही पढ़ते है.. उन्हे सिर्फ़ पाठक पढ़ते है..

Udan Tashtari said...

हमें तो आप अपना श्रोता ही मानें. :)

Krishan lal "krishan" said...

समीर जी
नम्स्कार । हजूर श्रोता क्या हम तो आपको अपना एक अच्छा ब्लाग मित्र मानते है जो मार्ग्दर्शन भी करता है और प्रोत्साहन भी देता है। आपना स्नेह बनाये रखियेगा हजूर

Pravesh Tyagi said...

very good....poet.


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