Monday, May 19, 2008

साफ कहता हूँ मुझे है प्यार तुम से हो चला

प्यार रिश्तों में बसाना बहुत जरूरी है
रिश्ते हैं वरना क्या कुदरत की थोपी हुई मज़बूरी हैं
 रिश्ता कोई भी हो 'प्यार' बिन मज़ा आता नहीं
लाख सुन्दर हो मगर महक बिना
फूल हर्गिज मन को महकाता नहीं
 'प्यार' क्या होता है ये मैं बताता हूँ तुम्हें
 किस हद तक हो सकता है ये करके दिखाता हूँ
 तुम्हें तुम कौन हो, पता नहीं
 तुम कैसी हो, देखा नहीं
तुम हो कहाँ, खबर नहीं
तेरी तस्वीर ही मिल जाये ये भी तो मुकद्दर नहीं
फिर भी ये 'दिल' है,
 तुम्हे अच्छी तरह पहचानता है
हर बार तुम करती हो 'ना' हर बार ये 'हाँ' मानता है
 ना तुझे छुआ है मैने ना किया तेरा दीदार है
 बस एक फूल की महक सा महसूस किया है तुझे
और देख ले, तस्वीर तेरी, दिल में मेरे तैयार है
 और ये भी है दावा मेरा खाली 'कहना-भर' नहीं
ये है तस्वीर तेरी हूबहू
खुद से मिला और देख थोड़ी भी इधर-उधर नहीं
तुम लाख पर्दों में रहो पर मुझ से तुम छुपी रहो
 इस कदर कमजोर मेरे प्यार की नजर नहीं
अब कहो तुम, ये प्यार नहीं या प्यार का ये असर नहीं
 मै पूरे होशोहवास से हर एक आम-ओ-खास से
 साफ कहता हूँ मुझे है प्यार तुम से हो चला
और इस 'इजहारे-इश्क' का मैने किया है खुद 'गुनाह'
 भूल से कोई जुर्म मुझ से आज तक नहीं हुआ
 देनी है कोई 'सजा' तो आज ही दे दो हजूर
 फिर ना कहना 'इकबाल-ए-जुर्म' हमनें कभी नहीं किया

4 comments:

मीत said...

देनी है कोई 'सजा' तो
आज ही दे दो हजूर
फिर ना कहना 'इकबाल-ए-जुर्म'
हमनें कभी नहीं किया
वाह साहब. "इकबाल-ए-जुर्म".
बहुत ख़ूब.

Krishan lal "krishan" said...

मीत जी
कविता की प्र्शंसा के लिये बहुत बहुत धन्य्वाद्।
वैसे भी प्यार कभी कभी इकबाले जुर्म ही बन जाता है अगर सामने वाला उस प्यार को स्वीकार ना करे तो

sushant jha said...

बहुत खूब...

Krishan lal "krishan" said...

sushant jha ji
aapakaa blaog par aane aur kavitaa ki prshansa ke liye shukriya