Tuesday, May 27, 2008

तुम जीत गयी मै हार गया

तुम जीत गयी मै हार गया
ना चाह कर भी जब तुमसे मै कर अनचाहा प्यार गया
 तुम ने तो कभी ये कहा नही तुम आओगी मुझसे मिलने
 क्यो दिल मे उमगें जगने लगी जब सान्झ लगी थोडा ढलने
 हर सान्झ ढले अम्बुआ के तले मै क्यो करने इन्तजार गया
 तुम जीत् गयी मै हार गया
 तुम थोड़ा सा क्या मुस्काई मै होकर पागल सौदाई
तुम्हें ऐसे अपना समझने लगा जैसे हो मेरी तुम परछाई
 है प्यार वही जो हो दोतरफा ये जान के भी
ना जाने क्यों मैं कर इकतरफा प्यार गया
तुम जीत् गयी मै हार गया रहने दे
जो बात अधूरी है नही होनी कभी ये पूरी है
ये जो तुम मे मुझ मे दूरी है
कुछ दोनों की मजबूरी है
मै प्यार बिना नही रह सकता
और तेरे लिये ये गैर जरूरी है
मानो ना मानो अपना तो
सारा जीवन बेकार गया
तुम जीत गयी मै हार गया

4 comments:

apurn said...

aap ki kavita ko padh ke apni he kuchh panktiyan yaad aagayin
अपने जज्बात छिपा पाना कितना मुश्किल होता है,
अपने हालात बता पाना कितना मुश्किल होता है,
कितना दर्द स उठता है जब लगता है तेरा प्यार नहीं मिल पायेगा,
फिर भी एक तरफा प्यार किये जाना कितना मुश्किल होता है|


achhi kavita

Udan Tashtari said...

बढ़िया है-तुम जीत गई मैं हार गया. उम्दा.

Krishan lal "krishan" said...

apurn ji
Aap ka kahna bilakul sahi hai. Ik tarfa pyaar kii takleef to vo hi jaan sakta hai jise kisi se ek tarfa pyaar ho jaye . Na dur rah rah kar chain milta hai na paas aa kar koi rahat milti hai. Na chup raha jaata hai na kuchh kaha jaata hai. Yun kaho ke Jis tan laage vo tan jaane.

Krishan lal "krishan" said...

sameer ji
namaskaar. aap ka bahut bahut shukriya kavita padhane aur pasand klarne ke liye