Thursday, June 18, 2009

तूँ किसी को भी मिले मुझ को तो मिलनी नहीं

 बात क्या तुम से करूँ जब बात कुछ बननी नहीं
 मैने कुछ कहना नहीं और तुम ने कुछ सुननी नही

 क्यों गिला तुम से करूं कि जख्म तूने है दिये
ढूँढ कर लाये कोई वो सीना जो छलनी नही

साफ ना कह दो तो शायद मै मना लूँ अपना मन
 यूँ टालने से प्यार की कोई बात तो टलनी नहीं

यूँ बात ना बिगाड़ ये गुडे गुडडी का खेल नहीं
इक बार जो बिगडी तो किसीसे भी संभलनी नहीं

 किस लिये बैठा रहूं दर पे तेरे मै रात दिन
 हक भी जब मिलना नहीं भीख भी मिलनी नही

तुमको भी मालूम है और मुझ को भी ये है पता
 तूँ किसी को भी मिले मुझ को तो मिलनी नही

3 comments:

श्यामल सुमन said...

रचना अच्छी लगी कृष्ण साहब। वाह।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

श्यामल सुमन said...

रचना अच्छी लगी कृष्ण साहब। वाह।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

"अर्श" said...

hamesha ki tarah ye gazal bhi khub kahi hai aapne .... magar kafi arse baad aapko padh rahaa hun ... achhi lagi gazal dhero badhaee


arsh