Wednesday, March 2, 2011

इससे तो अच्छा था नश्तर ही चुभा जाता कोई
 मरहम लगाये बिन अगर जाना था वापिस यार को

 जानता है जब मरीज़ कि मर्ज़ लाइलाज है
 बेकार है झूठी तसल्ली देना उस बीमार को

जीता जाए दिल किसीका हार कर अपना अहम्
 तो जीत से बेहतर समझ लो इस हसीन हार को

 माझी ही चाहता ना था कि पार पहुंचाता हमें
 छोड़ गया था किनारे पर ही वो पतवार को

हम किनारे पर भी होते तो भी डूबते सनम
बेवजह ही मुजरिम ना ठहरा माझी या मझधार को

साथ छोड़ने की बात करता था यार बार बार
हमने कहा 'आमीन' दिया छोड़ इस संसार को

आपका तो दावा था नया जख्म ना दोगे हमें
 किसलिए जख्मी किया फिर तुमने मेरे प्यार को

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