Monday, February 4, 2008

ये शहर कब्रिस्तान बनता जा रहा है

उपयोगिता तय करती है अब रिश्तों की नजदीकियां आदमी भी आजकल सामान बनता जा रहा है व्यक्तितव से ज्यादा महत्व उपयोगिता का हो गया कद नापना इन्सान का आसान बनता जा रहा है देख कर इन्सान का इन्सान बन पाना कठिन जिसको देखो आजकल भगवान बनता जा रहा है लोग कहते है कि उसके दर पे है मिलता सकून मेरे अन्दर फिर ये क्यों तूफान बनता जा रहा है किस के सिर पे पांव रख अब आगे बढेगा तूँ बता धरती का हर टुकड़ा जब आसमान बनता जा रहा है कल जहाँ कुछ भी ना था वहाँ आज छत तैयार है शायद बिना बुनियाद के मकान बनता जा रहा है
खून का रिश्ते तो अब पानी से पतले हो गये
खून इक मिटती हुई पहचान बनता जा रहा है
पहले जो कदमों की आहट तक से था पहचानता अब वो मेरी शक्ल से अन्जान बनता जा रहा है
ताकि उसकी इनायतों को भूल ना जाऊं कहीं जख्म भर चला है पर निशान बनता जा रहा है
जी हाँ कभी ये शहर था फिर जाने क्या चली हवा अब जिन्दा लाशों का ये कब्रिस्तान बनता जा रहा है

3 comments:

mehek said...

bahut khub,kaha paav rakhoge,dharti asman banti ja rahi.

Mired Mirage said...

सही कह रहे हैं ।
घुघूती बासूती

Krishan lal "krishan" said...

Thanks Mehek and mired mirage .

कहने सुनने से भी कुछ कम दर्द होता है जरूर
आप ने समझा सुना तो आपका शुक्रिया हजूर

Please continue encouraging.