Thursday, February 7, 2008

गैरत ज्यादा दिन बचे , मुमकिन नहीं

आप क्या महफिल में आये, उठके सब चलने लगे चिराग कुछ बुझने लगे , जिस्म कुछ जलने लगे ज्यादा पीकर के बहकते, तो कुछ समझ आता हमें पर आप तो दो चार घूँट, पीकर ही बहकने लगे कातिल नशा है शराब में या है साकी तेरे शबाब में उसे पी के खोये होश तो , तुझे देख सब मरने लगे है कैसी ये शराब और महफिल का साकी कैसा है ना पी तो लड़खड़ाये सब और पी तो संभलने लगे मेरी ना को तूँ ना ही समझ ये कोई झूठीमूठी ना नहीं हम वो नहीं जो इसरार से ना को हाँ मे बदलने लगे मेरी सोई गैरत को, उस दिन, ललकारा उसने इस तरह ना चाह कर भी प्यासे ही मह्फिल से हम चलने लगे प्यासा भी है रहना पड़ा ,और खाली भी लौटे है बहुत महफिल के सब दस्तूर, साकी, मुझपे अमल करने लगे उसकी गैरत ज्यादा दिन बच पाये ये मुमकिन नहीं जिस जेब में दौलत ना हों और प्यास भी बढने लगे

5 comments:

mehek said...

मेरी ना को तूँ ना ही समझ ये कोई झूठीमूठी ना नहीं
हम वो नहीं जो इसरार से ना को हाँ मे बदलने लगे

मेरी सोई गैरत को उस दिन ललकारा उसने इस तरह
ना चाह कर भी प्यासे ही मह्फिल से हम चलने लगे

प्यासा भी, रहना है पड़ा ,और खाली भी लौटे है बहुत
महफिल के सब दस्तूर साकी, मुझपे अमल करने लगे
fantastic presentation,bahut behtarin.

Krishan lal "krishan" said...

Mehek ji I have no appropriate words to express my gratitude and thanks for appreciating the lines .
I just say "THANKS".
May God bless you the way you want to be blessed.

संदीप said...

bahoot khoob krishna ji...behatarin kriti....umeed hai ki is tarah ke anmol ratan aapki kalam se aur nikale

संदीप said...

bahoot khoob krishan jee...aapki yeah kriti padh ke dil bag bag ho gaya

Krishan lal "krishan" said...

Thanks mr. Sandip for visiting the site and appreceating the poems. In fact

आप की नजर ही है कुछ पारखी
हम से जर्रा को भी जिसने आसमाँ बना दिया
कोशिश करेंगे उस उंचाई पे टिके रहने की हम
लेकिन ये मुमकिन है जो तेरी नजरों ना गिरा दिया