Tuesday, February 5, 2008

किस तरह गुजरे ये दिन तेरे बिन

ना पूछ मुझसे किस तरह गुजरे हैं मेरे दिन तुझसे मिले बिना या तुझसे बात किये बिन ज़ालिम लहर जैसे कोई मछली किनारे पटक गयी अगली लहर तक जान मछली की अधर मे लटक गयी तड़फड़ाती, छटपटाती, मरती जा रही थी वो चाह कर भी पानी तक ना पहुंच पा रही थी वो महसूस कर सके तो कर सोच पाये तो तूँ सोच किस तरह के दर्द से गुजरती जा रही थी वो जैसे मरीज-ए-सांस का हो वक्त बुरा आ गया मुंह से मास्क-आक्सीजन कोई जिसके हटा गया एक एक सांस के लिये, छटपटा रहा था वो अनचाही मौत की तरफ खिसकता जा रहा था वो हो सके तो कुछ तो उस पीड़ा को तूँ महसूस कर जिस पीड़ा के दौर से गुजरता जा रहा था वो मह्सूस कर सके तो कर ना कर सके तो सुन कुछ इस से भी बदतर हैं गुजरे मेरे रात दिन तुझसे मिले बिना और तुझसे बात किये बिन ए मेरी जानेमन, मेरी जाने मन, मेरी जानेमन वक्त का इक इक मिनट है यूँ गुजरता जा रहा नंगे बदन पे मोम ज्यों कोई कतरों में टपका रहा दर्द का एक एक लम्हा इस कदर लम्बा हुआ सदियों की सजा वक्त कुछ पल मे है देता जा रहा बस एक बात सोच कर मै दर्द सह गया सभी शायद रहम आजाये और मरहम लगाये तूँ कभी उस इक स्पर्श के लिये मै हजार जान भी वार दूं मै जहाँ की सह लूँ नफरतें, करे एक बार जो प्यार तूँ

2 comments:

mehek said...

duriyon ka dard bahut gehrai se bayan hua hai,dil ko chu gayi ye kavita.

Krishan lal "krishan" said...

जख्मों का मिलना,इस जहाँ में,आम सी ही बात है।
पर दर्द किसी का समझना सचमुच ये बड़ी बात है ।बहुत बहुत शुक्रिया, तहेदिल से शुक्रिया ।
महक जी