उस रोज़ मुझे तुम ऐसे मिली सर्दी में हो जैसे धूप खिली
गर्मी में धूप के मारे को जैसे मिल जाये घनी छाया
सदियों के प्यासे को जैसे जल का कोई स्त्रोत नजर आया
या कहो कि चाहत थी जल की पर मुझ को अमृतधार मिली
उस रोज़ मुझे तुम ऐसे मिली-----------
बिन दिशा भटकते इन्सा को जैसे कोइ दिशा दिखाई दी
तन्हाई से ऊबे इन्सा को पायल की झनक सुनाई दी
जैसे घनघोर अन्धेरे मे एकाएक कोई ज्योत जली
उस रोज़ मुझे तुम ऐसे मिली------
ज्यों भूख का मारा इन्सा कोई रोटी की थाली पा जाये
या मन में बसी तस्वीर कोई जिन्दा ही सामने आ जाये
या कहो कि जैसे बच्चे को मन पसन्द सी आइस क्रीम मिली
उस रोज़ मुझे तुम ऐसे मिली------
या किसी तपस्वी के समक्ष इष्टदेव अचानक आ जाये
या फिर फांसी के तख्त चढा कोई प्राणदान ज्यों पा जाये
या कहो कि मांगने वाले को मुंह मांगी कोई मुराद मिली
उस रोज़ मुझे तुम ऐसे मिली------
Monday, May 12, 2008
उस रोज़ मुझे तुम ऐसे मिली
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7 comments:
उस रोज़ मुझे तुम ऐसे मिली------
अच्छी उपमायें दीं हैं आपने रचना में..
***राजीव रंजन प्रसाद
good job
Rajiv ji
Bahut bahut shukriya upamaao ki prshansaa ke liye
kirti ji
thanks for appreceiating the work as good
बढ़िया है.
कृष्ण जी आपकी कविता बहुत बढि़या है पर मुझे लगता है कि आपने टाईप कर पेस्ट किया है। अगर आप कभी ऐसे कविता पेस्ट करें तो कंपोज बटन बंद कर दिया करें तब कविता ऐसे ही आयेगी जैसे आपने टाईप की है। यह एकदम गद्य की तरह लग रही है।
दीपक भारतदीप
Deepak ji
shukriya sujhaav ke liye aur kavitaa ko pasand karne ke liye
Samir ji ,
aap kaa bahut bahut shukriyaa hausala badhaane ke liye
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