Tuesday, May 13, 2008

अपने किये गुनाह भी वो मेरे नाम गिन गया

डूबता ना किस तरह तूँ ही बता मेरे खुदा
 एक तिनके का सहारा था सो वो भी छिन गया
 लेने या देने का सम्बन्ध कोई तो बाकी चाहिये
 पर अपना रिश्तेदार तो सारा हिसाब गिन गया
मेरा कोई गुनाह उसने माफ तो करना था क्या
अपने किये गुनाह भी वो मेरे नाम गिन गया
जिन्दगी के सफर में मित्रों का साथ यूँ रहा
 थे खोटे सिक्के जेब में बाज़ार थैले बिन गया
उस समय चिराग लेकर दोस्त सारे आ गये
रात सारी कट गयी , चढ जब उजरा दिन गया

6 comments:

शोभा said...

कृष्ण जी
सुन्दर लिखा है-
जिन्दगी के सफर में मित्रों का साथ यूँ रहा
थे खोटे सिक्के जेब में बाज़ार थैले बिन गया
बधाई स्वीकारें।

Krishan lal "krishan" said...

Shobha ji. AApka mere blog pe hardik swagat hai. rachanaa ko pasand karne ke liye shukriya

मीत said...

मेरा कोई गुनाह उसने माफ तो करना था क्या
अपने किये गुनाह भी वो मेरे नाम गिन गया
क्या बात है भाई .... बहुत बढ़िया.

Udan Tashtari said...

क्या बात है, बहुत खूब!!!

Krishan lal "krishan" said...

मीत जी और समीर जी
आप दोनो का जितना शुक्रिया अदा किया जाये उतना कम है आप हमेशा और बेहतर लिखने को प्रेरित करते रहते हैं इस गज़ल को पसन्द करने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया
मीत भाई एक राज की बात बताऊँ जो शेर आप ने पसन्द किया है वो काल्प्निक नही असली शेर है वही लिखा है ज़ो मेरे साथ गुजरा है एकदम जिन्दगी का कड़वा सच

gopal said...

bahut badiya litha h