Tuesday, May 6, 2008

हाँ लेकिन ये सच है तुम से प्यार बहुत करता हूँ

नहीं कहा है, नहीं कहुगा, मैं तुम पे मरता हूँ
हाँ लेकिन ये सच है तुम से प्यार बहुत करता हूँ
 तेरे नयना अच्छे लगते, तेरा चेहरा मुझ को भाता
 तुझ से बात करूँ तो, मन को अजब सकूँ सा है मिल जाता
 जब भी दिल में दर्द उठा है, बस तेरी ही याद आई
खुदा की बारी भी ऐसे में, अकसर तेरे बाद आई
 जी करता है, सब को छोड़ कर, पास तेरे मै आ जाऊँ
या फिर पंख लगा, तेरे संग, दूर कहीं मै उड़ जाऊँ
 पर ये सब कैसे कर पाऊँ सैयाद से डरता हूँ
 हाँ फिर भी ये सच है तुम से प्यार बहुत करता हूँ
 सूरज की गर्मी का मारा ढूंढे हर कोई छाया
प्यास लगे तो कौन नही है पास कुँए के आया
 मै भी तुम तक आ पहुंचा चाहे तो प्यास बुझा दो
 या फिर तुम भी निष्ठुर होकर प्यासा ही लौटा दो
तुम चाहो तो हर सकती हो मेरे मन की पीर
चिड़ी  चोंच भर ले गयी नदी न घट्यो नीर
 जितना तुम मुझ को भाती हो, काश मै तुम को भाता
 तो फिर इस जग में जीने का, अर्थ मुझे मिल जाता
 बस, इतनी सी चाहत है, कहने से डरता हूँ डरता हूँ
 क्योंकि, मै तुम से प्यार बहुत करता हूँ

शीशे के घरों में रहते हो और पत्थर फैंकते हो मुझ पर

जब दिल मे प्यार बचा ही नही  इक बार में रिश्ता खत्म करो
 बेजान हुए रिश्तों की लाश को मुझसे नहीं ढोया जाता
 जब मन में कोई खुशी ना हो होंठों से हंस कर क्या हासिल
जब दिल में कोई दर्द ना हो आँखो से नही रोया जाता
 तकलीफ मुझे पल पल दे कर तुमने चाहा हर खुशी मिले
 अजी आम अगर खाने हों तो बबूल नहीं बोया जाता
 इक इक रिश्ते के मरने पर इतना रोया कि मत पूछो
 नही आँख मे आँसू बचा कोई अब मुझसे नहीं रोया जाता
 है कौन सा दामन जिसमें कभी दाग कोई भी लगा ना हो
हर दाग के चक्कर में अपना दामन तो नहीं खोया जाता
 और ये कौन तरीका ढूंढा है दामन से दाग छुडाने का
दागी दामन को गलियों में सरे आम नहीं धोया जाता
 लूट हजारो और लाखों तू जो सैकड़ों बांटता फिरता है
 यूँ पुण्य नहीं हासिल होता यूँ पाप नहीं धोया जाता
 शीशे के घरों में रह्ते हो और पत्थर फैंकते हो मुझ पर
 शुक्र करो मुझ से अपना कभी होश नहीं खोया जाता
 उतना ना सही कुछ कम ही सही है अब भी माल तेरे घर में
ऐसे में खुले दरवाजे रख बेफिक्र नहीं सोया जाता

Monday, May 5, 2008

चल छोड़ किनारे को साथी आ आज बीच मझधार चले

चल छोड़ किनारे को साथी, आ आज बीच मझधार चलें
 इस पार तो सब कुछ देख लिया अब देखने कुछ उस पार चलें
 मत सोच कहेगी क्या दुनिया, दुनिया तो कहती रहती है
जो सहज लगे सो जीता जा जैसे कोई नदिया बहती है
 क्या सही ग़लत क्या पाप पुण्य सारी इस पार की बातें हैं
 हर रोज़ जो बद्ले परिभाषा सच मान बेकार की बातें हैं
 आ, छोड़ बेकार की बातों को, करने सपने साकार चलें
चल छोड़ किनारे………
 हर काम किया पर डर डर के, तूं जितना जिया सब मर मर के,
कोई खुशी अगर तूने पाई दुनिया को जो रास नहीं आई
पाई तो खुशी पर डर डर के या मन में ग्लानि को भर के
 उस खुशी से मिलती कहाँ खुशी जो मन में ग्लानि भर जाये
वो कश्ती पार नहीं जाती जिस कश्ती मे पानी भर जाये
 तूँ चेहरे से मुस्काता रहा पर मन मे करता रहा रुदन
अब छोड़ दे ये नकली जीवन और खोल दे मन का हर बंधन
 तन मन दोनों पुलकित हो जहाँ आ ढूंढने वो संसार चले
 कर हिम्मत आ उस पार चलें आ आज बीच मझधार चलें
इस पार तो सब कुछ देख लिया अब देखने कुछ उस पार चलें

Friday, May 2, 2008

जब कोई मुस्का के मिलने लगता है

जब कोई मुस्का के मिलने लगता है
 अपनो से भी ज्यादा अपना लगता है
 फिर मेरे आँगन मे कोई चाँद उतरने लगता है
 फिर ये मन का पंछी ऊँचे गगन मे उडने लगता है
 फिर इस ठूंठ की डाली डाली कोंपल फूटने लगती है
 फिर मुरझाये पौधो मे कोई फूल निकलने लगता है
 फिर सूखे खेतो में जैसे पानी पडने लगता है
 फिर बीजों से जैसे कोई अंकुर फूटने लगता है
 कया नही जानता बीज जमीं में पडे पडे सड जाते है
 नही पता क्या बादल अक्सर बिन बरसे उड जाते हैं
 फिर भी नील गगन में जब कोई बादल दिखने लगता है
 मुझ को मन की धरा पे बहता दरिया दिखने लगता है
 हर पल यूँ लगता है बादल अब बरसा कि तब बरसा
 कैसा भी हो मौसम मुझ को सावन लगने लगता है
 और कोई हंस कर जब मुझको कहने लगता है अपना
नयनो में बसने लगता है फिर से एक नया सपना
फिर से सारे रिश्ते मुझको सच्चे लगने लगते हैं
क्या अपने क्या बेगाने सब अपने लगने लगते हैं
 व्यापारियों की इस दुनिया में मै प्यार ढूंढता फिरता हूँ
सब कह्ते है नहीं मिलेगा बेकार ढूंढता फिरता हूँ

Thursday, May 1, 2008

खुद अपनी फिक्र करना सीख वरना जी ना पायेगा

खुद अपनी फिक्र करना सीख वरना जी ना पायेगा
कि आखिर में तेरा तुझ से ही रिश्ता काम आएगा 

 बना तूँ लाख रिश्ते , पर ना इनको आजमाना तुम
ये दुनिया है, इस दुनिया में , नही  कोई काम आयेगा 

 है इन्साँ क्या अजीबोचीज, ग़र सोचो, तो जानोगो
ये  इक सुख पाने की खातिर हज़ारों दुख उठाएगा

बहुत पाने के चक्कर में, ना जाने क्या क्या खो डाला
इधर से पायेगा  इन्सां , उधर से खोता जाएगा

लगा कर देख लेना , तूँ हिसाब , जब भी जी चाहे
 कि तेरे हाथ में आखिर तो बस "ज़ीरो" ही आयेगा 

 गये वो दिन सुनहरी मछलिया मिलती थी पानी मे
 अब गंगा हो , कि हो यमुना, सिर्फ घड़ियाल आयेगा 

 निगलना इनकी फितरत है, तो  इक दूजे को निगलेंगें
 निगलते थे जिसे मिलकर, वो जब नहीं हाथ आएगा

जीवन के इस सफर में, इक इक बन्धन ऐसा टूटा



इक इक करके हम से छूटे, सारे रिश्ते ऐसे 
पतझड़ के मौसम में झड़ते, पेड़ से पत्ते जैसे 
 अब इस पेड़ पर नहीं बचा है, एक भी पत्ता बाकी
 देखें कबतक खड़ा रहेगा, अब ये ठूंठ एकाकी

छोड़ घौसला पक्षी उड़ गये, जब कुछ नज़र ना आया
 अपना कहने वालों ने, बस, इतना साथ निभाया 
 क्च्चे धागे से भी क्च्चा, हर इक रिश्ता निकला
 हल्की सी जो तपिश लगी, तो बर्फ के जैसा पिघला
 जीवन के इस सफर में, इक इक बन्धन ऐसा टूटा 
मानो कोई रेत का घर था, या फिर ख्वाब था झूठा 
 पर फिर इक दिन बारिश होगी, फिर मौसम बदलेगा 
फिर फूटेगी कोंपल, पत्ता नया कोई निकलेगा
 फिर कोई पक्षी, इसकी, किसी डाली पे नीड़ धरेगा
 कोई तो होगा जो आकर, कभी मेरी पीड़ हरेगा
 उस दिन छोड़ के जाने वालों, शायद तुम भी आओ 
जब अपना लेंगें दूजे, तब, तुम भी ह्क जतलाओ