Friday, April 17, 2009

कश्ती डूबने से जयादा गम हुआ इस बात का
 दोस्त भी शामिल थे  साहिल के तमाशाईयो मे

 बातें ही करते है सब इमदाद कुछ करते नही
दोस्ती अब रह गयी है गजलो और रुबाईयो मे

कौन बूढी मां को रखे कौन रखे बाप को
बहस है छिडी हूई कई रोज से दो भाईयो मे

 मुर्गी तो जान से गयी झटका हो कि हलाल हो
फर्क करते रह गये हम दो तरह के कसाईयो मे

क्या क्या किये बुढापे को छुपाने के हमने   यत्न
पर राज सारे खोल डाले चेहरे की झाईयों  ने

 देखो तो किस मुकाम पे यारो ने पंहुचाया हमें
 हैं भीड मे तन्हा मगर तन्हा नही तन्हाईयो मे

कतरे कतरे से समुन्दर बन नही सकता कभी
 जान लोगे उतरोगे जब इसकी तुम गहराईयों में

मेरी बरबादी पे दुश्मन किस लिये इतरा रहे
अपने  सब  शामिल थे मेरे मेरी इन तबाहइयों मे

6 comments:

अनिल कान्त : said...

वाह ...छा गए आप ....बहुत कमाल का लिखा है ...दिल खुश हो गया

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

रंजीत said...

har panktee sachhaee ko kholtee hai aur sochne ke liye badhya kartee hai.
badhee
Ranjit

Krishan lal "krishan" said...

Shukriya anil ji aur ranjit ji ghazal ko pasand karne ke liye

रंजना said...

Waah ! Waah ! Waah ! Sabhi sher ek se badh kar ek...

Sundar gazal...

Krishan lal "krishan" said...

रंजना जी
आप को रचना पसन्द आई अच्छ लग ।आपने खुले दिल से प्रशसा की उसके लिये बहुत बहुत शुक्रिया

परमजीत बाली said...

वाह!!बहुत बढिया गज़ल है। सभी शेर एक से बढ कर एक हैं।