Tuesday, June 2, 2009

अपनी ही खनक से जो टूटी थी तेरी चूड़ीयां

जितने भी थे इल्जाम सारे मेरे नाम हो गये
चलो इसी बहाने तेरे सारे काम हो गये

साथ छूटने का गम ,यूँ भी तो , कुछ कम ना था
 पर तूँ जुदा हुआ तो यूँ , हम बदनाम हो गये

लेकिन नहीं मुझ को रहा ,तुझ से कोई भी गिला
 जब ये सोचा ,साथ रह के, तुझ को मुझ से क्या मिला

 मैं ना कहता था, कि मेरे , आसुऔ को पोछ मत
ला आंचल हो गया, तो, इस में मेरी क्या खता

आयेगा वो वक्त भी जब सोचना होगा तुझे
मुझसे जुदा तूँ है भला ,या साथ मेरा था भला

 पहले तो हर इल्जाम , मेरे सर पे रख देता था तूँ
 मै नही हूँ साथ , तो ,किस की बतायेगा खता

अपनी ही खनक से जो टूटी थी तेरी चूड़ीयां
उनका भी इल्जाम मेरे सर पे रख के क्या मिला

3 comments:

gargi gupta said...

bhut ki bhav purn rachna
man ko chhugai
likhte rahiye dard main man ki sachchi baat juban par aa jati hai

रज़िया "राज़" said...

अपनी ही खनक से जो टूटी थी तेरी चूड़ीयां
उनका भी इल्जाम मेरे सर पे रख के क्या मिला
वाह1111

Krishan lal "krishan" said...

shukriya razia ji aur gargi ji .